पीडीए चौपाल में जनसरोकार पीछे, मंच पर नोटों की बारिश आगे!विधायक बनने की चाहत में फौजी से नेता बने गौरीशंकर गुप्त का अनोखा अंदाज, बिरहा गायिका की तान पर उड़ाए नोट

Bureau Report News 18 Plus Bureau/ Rakesh Tripathi

जनता के मुद्दों के बीच मंच पर दिखा सियासी तमाशा।

महराजगंज। राजनीति का रंग भी अजीब है। कभी यह अनुशासन की मिसाल रहे लोगों को भी ऐसे अंदाज में ला खड़ा करती है, जिसकी चर्चा मंच से ज्यादा जनता के बीच होने लगती है। निचलौल ब्लॉक के बढ़या मुस्तकीम उर्फ गेरहवा गांव में आयोजित PDA चौपाल कार्यक्रम में रविवार को कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला। विधायक बनने की हसरत संजोए फौजी से नेता बने गौरीशंकर गुप्त कार्यक्रम में पहुंचे तो थे जनता के बीच अपनी सियासी जमीन मजबूत करने, लेकिन भोजपुरी बिरहा गायिका की सुरीली तान छिड़ते ही मंच का माहौल जनसंवाद से बदलकर मनोरंजन की महफिल में तब्दील होता नजर आया।

 

जनता के मुद्दों के बीच मंच पर उड़ा पैसा, सियासत का बदला अंदाज

 

कार्यक्रम के दौरान भोजपुरी बिरहा गायिका की प्रस्तुति पर गौरीशंकर गुप्त द्वारा मंच से नोट उड़ाए जाने का वीडियो और चर्चा सामने आई है। हालांकि, इस घटनाक्रम की स्वतंत्र पुष्टि और उड़ाए गए नोटों की वास्तविक राशि की पुष्टि नहीं हो सकी है। लेकिन यदि मंच पर नोट उड़ाने का यह दृश्य सही है, तो यह सवाल जरूर खड़ा करता है कि जनता के बीच आयोजित राजनीतिक कार्यक्रमों में जनसरोकारों की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए?

 

एक ओर गांव की जनता अपनी समस्याओं, विकास, रोजगार, शिक्षा, सड़क, बिजली और अन्य स्थानीय मुद्दों को लेकर राजनीतिक प्रतिनिधियों से उम्मीद लगाए बैठती है। दूसरी ओर उसी मंच पर जब संभावित जनप्रतिनिधि का अंदाज आर्केस्ट्रा शैली का नजर आए, तो चर्चा होना स्वाभाविक है। आखिर PDA चौपाल जनता की आवाज सुनने का मंच था या फिर सियासी शो का नया रंगमंच?

 

फौजी अनुशासन से सियासी मंच तक, सवालों के घेरे में अंदाज

फौज में अनुशासन को सर्वोच्च माना जाता है। वर्दी पहनकर देश की सेवा करने वाले जवानों से संयम, मर्यादा और जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है। गौरीशंकर गुप्त भी सैन्य पृष्ठभूमि से आते हैं और अब राजनीति में अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में मंच पर नोट उड़ाने का कथित अंदाज उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को लेकर सवाल खड़े करता है।

 

यह सवाल किसी व्यक्ति के मनोरंजन पसंद करने पर नहीं, बल्कि उस मंच की गरिमा पर है, जहां जनता अपने भविष्य और क्षेत्र के विकास की उम्मीद लेकर पहुंचती है। सार्वजनिक कार्यक्रमों में जनप्रतिनिधि बनने की इच्छा रखने वाले नेताओं का आचरण ही उनकी राजनीतिक प्राथमिकताओं का संदेश देता है।

 

चुनाव से पहले ही मंच पर प्रदर्शन, आगे जनता क्या उम्मीद करे?

 

राजनीति में जनता केवल भाषण नहीं सुनती, बल्कि नेताओं के व्यवहार को भी परखती है। चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे किसी दावेदार के लिए हर सार्वजनिक मंच एक अवसर होता है—अपनी सोच, कार्यशैली और जनप्रतिबद्धता दिखाने का। ऐसे में यदि जनसंवाद के बीच नोटों की नुमाइश सुर्खियां बनने लगे, तो यह सियासी दावेदार के लिए आत्ममंथन का विषय होना चाहिए।

 

गौरीशंकर गुप्त का यह कथित अंदाज अब स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं का हिस्सा बन गया है। लोग सवाल कर रहे हैं कि विधायक बनने का सपना देखने वाले नेता क्या जनता के मुद्दों पर भी उतनी ही गंभीरता दिखाएंगे, जितनी मंच पर मनोरंजन के दौरान नजर आई? क्या चौपालों का उद्देश्य जनता की समस्याओं को सुनना और समाधान की दिशा तय करना है, या फिर ऐसे आयोजनों में राजनीतिक छवि चमकाने के लिए अलग-अलग रंग दिखाना?

 

जनप्रतिनिधित्व की गरिमा का सवाल

 

जनता किसी भी नेता को केवल उसके दावों से नहीं, बल्कि उसके आचरण से भी आंकती है। मंच पर नोट उड़ाना अपने आप में कोई अपराध घोषित नहीं किया जा सकता, लेकिन सार्वजनिक राजनीतिक कार्यक्रम में ऐसा प्रदर्शन जनप्रतिनिधित्व की गरिमा और प्राथमिकताओं पर सवाल जरूर खड़ा करता है।

 

गौरीशंकर गुप्त के इस घटनाक्रम पर उनकी ओर से कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने आया है या नहीं, इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है। ऐसे में जनता के बीच उठ रहे सवालों का जवाब देना उनकी जिम्मेदारी बनती है। क्योंकि विधायक बनने की चाहत रखने वाले नेता से जनता केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि गंभीर नेतृत्व, संयम और अपने मुद्दों के प्रति जवाबदेही की उम्मीद करती है।

 

अब देखना यह होगा कि PDA चौपाल के मंच से उठी नोट उड़ाने की यह चर्चा गौरीशंकर गुप्त की सियासी पहचान को किस दिशा में ले जाती है—जनता के मुद्दों के गंभीर नेतृत्व की ओर या फिर मंचीय प्रदर्शन की राजनीति की ओर।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *