*महराजगंज में शराब माफिया का खेल बेनकाब: पुरानी शराब पर नया स्टिकर, ग्राहकों से खुली लूट — एसपी के आदेश पर जांच तेज।*

ब्यूरो रिपोर्ट/दिलीप कुमार पाण्डेय सिंदुरिया

 

महराजगंज (सिंदुरिया):जनपद के सिंदुरिया थाना क्षेत्र अंतर्गत चिउटहां चौकी के पास स्थित देउरवा सरकारी कंपोजिट शराब की दुकान पर बड़े पैमाने पर अनियमितताओं का खुलासा हुआ है। आरोप है कि दुकान संचालक खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए पुरानी शराब पर नया स्टिकर चिपकाकर उसे नए माल के रूप में बेच रहे हैं और ग्राहकों से अधिक कीमत वसूल रहे हैं।

 

स्थानीय लोगों के अनुसार, यह खेल काफी समय से चल रहा था, लेकिन अब मामला तब तूल पकड़ गया जब मीडिया रिपोर्ट सामने आई। आरोप यह भी है कि पुराने स्टॉक की शराब को CL-2 (देशी शराब श्रेणी) के नाम पर ग्राहकों को थमाया जा रहा है, जो आबकारी नियमों का सीधा उल्लंघन है। इससे न सिर्फ उपभोक्ताओं की जेब पर डाका डाला जा रहा है, बल्कि उनके स्वास्थ्य के साथ भी गंभीर खिलवाड़ किया जा रहा है।

 

न्यूज 18प्लस के खबर का असर, पुलिस हरकत में

मामले को गंभीरता से लेते हुए जिले के तेज-तर्रार पुलिस अधीक्षक शक्ति मोहन अवस्थी ने तुरंत संज्ञान लिया और सिंदुरिया थानाध्यक्ष राजकुमार सिंह को जांच कर कड़ी कार्रवाई करने के निर्देश दिए। बताया जा रहा है कि इस पूरे मामले की सूचना बीती रात ही थानाध्यक्ष को दे दी गई थी, जिसके बाद पुलिस टीम सक्रिय हो गई है।

 

थानाध्यक्ष क्या कहते हैं 

सिंदुरिया थानाध्यक्ष राजकुमार सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि जांच में यह साबित होता है कि पुरानी शराब पर नया स्टिकर लगाकर बिक्री की जा रही है, आबकारी इंस्पेक्टर गिरीश कमार ने थानाध्यक्ष राजकुमार सिंह को बताया कि 1 अप्रैल से शराब क़ीमत बढ़ी है, पुराने शराब अलग से पैसा जमा करा कर  CL-2 का स्टीकर बेचने की बात कही जबकि यह कानूनी अपराध है।

 

बड़ा सवाल: किसकी शह पर चल रहा खेल?

अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इतने लंबे समय से यह अवैध वसूली और फर्जीवाड़ा किसकी शह पर चल रहा था? क्या आबकारी विभाग की भूमिका भी संदेह के घेरे में है? या फिर स्थानीय स्तर पर मिलीभगत से यह पूरा खेल संचालित किया जा रहा था?

 

जनता में आक्रोश, कार्रवाई की मांग

घटना के सामने आने के बाद क्षेत्रीय लोगों में भारी आक्रोश है। लोगों ने मांग की है कि दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के साथ-साथ लाइसेंस निरस्त किया जाए, ताकि भविष्य में इस तरह की धोखाधड़ी पर पूरी तरह लगाम लग सके।

निष्कर्ष:

यह मामला सिर्फ अवैध वसूली तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक निगरानी और सिस्टम की पारदर्शिता पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है। अब देखना होगा कि जांच के बाद क्या वाकई दोषियों पर कार्रवाई होती है या फिर यह मामला भी ठंडे बस्ते में चला जाता है।

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