*महराजगंज में ‘फटी शर्ट’ की आड़ में सच का गला घोंटने की कोशिश!*

ब्यूरो रिपोर्ट /दिलीप कुमार पाण्डेय

निचलौल महराजगंज 

महराजगंज। होली के रंगों और भाईचारे के संदेश के बीच 03 मार्च 2026 को जिला आबकारी कार्यालय में जो हुआ, उसने न सिर्फ एक पत्रकार का, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का भी अपमान किया। यह घटना सीधे-सीधे सवाल उठाती है कि क्या सच्चाई लिखना अब अपराध बन चुका है?

खबर छापी, तो मिली ‘सार्वजनिक सजा’!

सूत्रों के अनुसार, स्थानीय अब तक टीवी चैनल के पत्रकार राकेश त्रिपाठी होली मिलन के उपलक्ष्य में जिला आबकारी अधिकारी कार्यालय पहुंचे थे। गाड़ी से उतरते ही उन्हें आबकारी निरीक्षक (निचलौल) वैभव यादव, आबकारी निरीक्षक (सदर) गिरीश कुमार और कार्यालय के बड़े बाबू ने घेर लिया।

 

प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि वैभव यादव ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा,

 

आप हमारी खबरें बहुत मन से छापते हैं और कमिश्नर साहब को टैग करके ट्वीट करते हैं।

इसके बाद उन्होंने अपनी फटी हुई शर्ट की आस्तीन दिखाते हुए तंज कसा—

 

आज मेरी शर्ट फटी हुई है, इसे भी अखबार में छाप दीजिएगा और कमिश्नर साहब को टैग कर दीजिएगा।

यह संवाद किसी मज़ाक का हिस्सा नहीं था, बल्कि एक पत्रकार को सार्वजनिक रूप से नीचा दिखाने और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने की सुनियोजित कोशिश थी।

सवालों से घबराया विभाग?

आबकारी विभाग की अनियमितताओं को लेकर पहले भी खबरें प्रकाशित होती रही हैं। आरोप है कि इन्हीं खबरों से बौखलाए अधिकारियों ने यह ‘संदेश’ देने की कोशिश की कि जो भी विभाग की कमियों को उजागर करेगा, उसका इसी तरह मज़ाक उड़ाया जाएगा।

 

आबकारी निरीक्षक (सदर) गिरीश कुमार द्वारा भी कथित तौर पर उपहास में शामिल होना यह दर्शाता है कि विभाग के भीतर आलोचना सहने की लोकतांत्रिक संस्कृति का अभाव है।

 

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर हमला

पत्रकारिता कोई अपराध नहीं, बल्कि लोकतंत्र की नींव है। यदि अधिकारी अपनी जवाबदेही से बचने के लिए पत्रकारों को सार्वजनिक रूप से अपमानित करेंगे, तो यह सीधे-सीधे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है।

 

पत्रकार जगत में इस घटना को लेकर तीव्र आक्रोश है। कई पत्रकारों का कहना है कि यह पहली बार नहीं है—पहले भी खबरों को लेकर कथित दबाव और धमकी की बातें सामने आ चुकी हैं।

 

प्रशासन चुप क्यों?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जिला प्रशासन इस घटना का स्वतः संज्ञान लेगा?

क्या संबंधित अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगा जाएगा?

या फिर सच लिखने वालों को यूँ ही अपमानित किया जाता रहेगा?

अगर एक पत्रकार को खुलेआम अपमानित किया जा सकता है, तो आम नागरिक के साथ व्यवहार कैसा होगा—यह सोचकर ही चिंता होती है।

मांग

घटना की निष्पक्ष जांच हो।

संबंधित अधिकारियों के आचरण की विभागीय समीक्षा हो।

पत्रकारों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित किया जाए।

होली के अवसर पर रंगों की आड़ में अगर सच्चाई को बदरंग करने की कोशिश की जाएगी, तो यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।

क्या सच्चाई लिखना अब अपराध है?

महराजगंज को इस सवाल का जवाब चाहिए।

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