न्यूज रिपोर्ट/ राकेश त्रिपाठी निचलौल महराजगंज
प्रधान सम्पादक
निचलौल (महराजगंज)। रोज़गार की तलाश में गांव छोड़कर शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर ग्रामीणों की पीड़ा के बीच मनरेगा जैसी महत्वाकांक्षी योजना का उद्देश्य कहीं खोता नजर आ रहा है। विकास खंड निचलौल की ग्राम सभा रामचंद्रही से सामने आया मामला बताता है कि जिन हाथों को गांव में काम देकर रोका जाना था, वही हाथ आज मजबूरी में बाहर जाने को विवश हैं, जबकि कागजों में गांव “पूर्ण रोजगार” की तस्वीर पेश कर रहा है।
ग्राम सभा रामचंद्रही निवासी छोटेलाल पुत्र महेश भारती (जॉब कार्ड संख्या–1022) शारीरिक रूप से दिव्यांग हैं। वे सामान्य रूप से चलने-फिरने में भी असमर्थ हैं, लेकिन रिकॉर्ड में उन्हें मनरेगा का नियमित मजदूर दिखाया जा रहा है। न उन्होंने कभी काम की मांग की और न ही कार्य करने की स्थिति में हैं, फिर भी उनके नाम पर मस्टर रोल तैयार होना यह सवाल खड़ा करता है कि गांव में वास्तव में काम कौन कर रहा है और मजदूरी किसे मिल रही है।
सूत्रों के अनुसार, रोजगार सेवक द्वारा कागजों में मजदूरों की संख्या पूरी दिखाने के लिए ऐसे लोगों के नाम जोड़े जा रहे हैं, जो काम करने में असमर्थ हैं। नतीजा यह है कि गांव के सक्षम श्रमिकों को समय पर काम नहीं मिल पाता और वे रोज़गार के लिए बाहर पलायन करने को मजबूर हो जाते हैं। प्रवास पर गए श्रमिकों के परिवार गांव में रहकर सरकारी योजनाओं की आस लगाए बैठे रहते हैं, जबकि फाइलों में सब कुछ दुरुस्त दिखाया जाता है।
चर्चा यह भी है कि एक ही रोजगार सेवक द्वारा कई ग्राम सभाओं का कार्यभार संभाला जा रहा है। नियमों को ताक पर रखकर बनाई गई इस व्यवस्था में जवाबदेही का अभाव साफ झलकता है। सवाल उठता है कि जब गांव से श्रमिक पलायन कर रहे हैं, तो फिर मनरेगा में मजदूरों की पूरी हाजिरी कैसे दर्ज हो रही है? क्या इसकी जानकारी खंड विकास अधिकारी, तकनीकी सहायक और अन्य जिम्मेदार अधिकारियों को नहीं है?
यह मामला केवल कागजी अनियमितता का नहीं, बल्कि उस प्रवासी श्रमिक की त्रासदी का प्रतीक है, जिसे गांव में काम मिलना चाहिए था। दिव्यांग व्यक्ति के नाम पर दर्ज मजदूरी आखिर किन खातों में जा रही है, यह जांच का विषय है। यदि मनरेगा का लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक नहीं पहुंचा, तो ग्रामीणों का पलायन रुकने के बजाय और तेज होगा।
अब नजरें जिला प्रशासन पर टिकी हैं कि वह इस मामले को गंभीरता से लेकर जांच कराता है या फिर यह भी अन्य शिकायतों की तरह फाइलों में ही दफन हो जाएगा। प्रवास रोकने के लिए बनी योजना यदि कागजों तक सीमित रह गई, तो गांव खाली होते रहेंगे और व्यवस्था सवालों के घेरे में।