*निचलौल वन रेंज बना तस्करों की ‘सेफ लेन’, रेंजर की चुप्पी पर उठे सवाल।*

ब्यूरो रिपोर्ट/ अमन गुप्ता

निचलौल महराजगंज 

 

महराजगंज/निचलौल: भारत-नेपाल सीमा से सटे निचलौल के बेशकीमती जंगलों पर इन दिनों लकड़ी तस्करों का ग्रहण लगा हुआ है। वन विभाग की कथित सुस्ती और अधिकारियों की रहस्यमयी चुप्पी ने तस्करों के हौसले इतने बुलंद कर दिए हैं कि अब दिन के उजाले में भी बेखौफ होकर लकड़ियों की तस्करी की जा रही है।

 

दहाड़ते ट्रैक्टर और नदारद परमिट:

 

ताजा मामला बीते सोमवार का है, जब ढ़ेसो पुल से निचलौल की ओर लकड़ियों से लदी एक महिंद्रा ट्रैक्टर-ट्राली को फर्राटा भरते देखा गया। प्रत्यक्षदर्शियों और सामने आए वीडियो साक्ष्यों के अनुसार, ट्राली पूरी तरह से प्रतिबंधित लकड़ियों से भरी हुई थी। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इस परिवहन के पास न तो कोई वैध परमिट था और न ही वन विभाग का कोई डर। मुख्य मार्ग से तस्करी का यह खेल विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा रहा है।

 

रेंजर सुनील राव की चुप्पी के क्या हैं मायने?

 

इस पूरे प्रकरण में जब निचलौल वन क्षेत्राधिकारी (रेंजर) सुनील राव से उनका पक्ष जानने के लिए संपर्क करने की कोशिश की गई, तो उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। रेंजर का फोन न उठाना और प्रकरण पर चुप्पी साधे रखना क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि:

 

1) क्या रेंजर की नाक के नीचे हो रही इस तस्करी की उन्हें जानकारी नहीं है?

 

2) या फिर ‘मौन’ रहने के पीछे कोई विभागीय मिलीभगत है?

 

खतरे में जैव विविधता:

जंगलों से जिस तरह अंधाधुंध अवैध कटान हो रहा है, उससे न केवल राजस्व की हानि हो रही है बल्कि क्षेत्र का पारिस्थितिकी तंत्र भी बिगड़ रहा है। यदि जिम्मेदार अधिकारी इसी तरह कुंभकर्णी नींद में सोए रहे, तो निचलौल के जंगलों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।

स्थानीय लोगों ने बताया कि, “जब रक्षक ही मौन हो जाए, तो भक्षक बेखौफ होंगे ही। निचलौल रेंज में कानून का खौफ खत्म हो चुका है।”

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