रिपोर्ट राकेश त्रिपाठी महराजगंज
प्रयागराज :इलाहाबाद हाईकोर्ट ने झूठी और दुर्भावना पूर्ण एफआईआर के बढ़ते चलन पर कड़ा रुख अपनाते हुए पुलिस को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि यदि किसी मामले में जांच के बाद एफआईआर झूठी पाई जाती है, तो केवल फाइनल रिपोर्ट दाखिल करना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि झूठी शिकायत दर्ज कराने वाले व्यक्ति के खिलाफ कानून के तहत आवश्यक आपराधिक कार्रवाई भी की जानी चाहिए।
मामला- हाईकोर्ट के समक्ष याचिका में यह मुद्दा उठाया गया कि कई मामलों में पुलिस द्वारा झूठी एफआईआर दर्ज होने के बावजूद, जांच के बाद केवल क्लोजर या फाइनल रिपोर्ट लगा दी जाती है, जबकि झूठी शिकायत करने वाले के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाती। इससे निर्दोष व्यक्तियों को अनावश्यक रूप से आपराधिक मुकदमों का सामना करना पड़ता है और कानून का दुरुपयोग बढ़ता है।अदालत के समक्ष मुख्य प्रश्न-हाईकोर्ट के सामने केंद्रीय सवाल यह था कि क्या झूठी एफआईआर दर्ज कराने वाले व्यक्ति को बिना किसी दंड के छोड़ देना कानूनन उचित है, और क्या पुलिस का यह दायित्व नहीं बनता कि वह ऐसे मामलों में आगे की कार्रवाई करे।इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी-अदालत ने कहा कि झूठी एफआईआर न केवल आरोपी व्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाती है, बल्कि न्यायिक व्यवस्था पर भी अनावश्यक बोझ डालती है। यदि जांच में यह स्पष्ट हो जाए कि शिकायत झूठी, मनगढ़ंत या दुर्भावना पूर्ण थी, तो पुलिस का कर्तव्य है कि वह संबंधित धाराओं के तहत शिकायतकर्ता के खिलाफ केस दर्ज करे।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि कानून का इस्तेमाल बदले की भावना या दबाव बनाने के लिए नहीं किया जा सकता। झूठे मामलों को बढ़ावा देना न्याय व्यवस्था की साख को कमजोर करता है।पुलिस के लिए स्पष्ट निर्देश-अदालत ने निर्देश दिया कि-झूठी एफआईआर पाए जाने पर संबंधित शिकायतकर्ता के खिलाफ वैधानिक कार्रवाई की जाए। केवल फाइनल रिपोर्ट लगाकर मामले को समाप्त न किया जाए। ऐसे मामलों में जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
न्यायिक संतुलन पर जोर-
हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि यह निर्देश वास्तविक पीड़ितों को हतोत्साहित करने के लिए नहीं है, बल्कि उन मामलों पर अंकुश लगाने के लिए है,जहां कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है। सच्ची शिकायतों को पूरा संरक्षण मिलेगा, लेकिन झूठे आरोपों को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
निष्कर्ष-इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला यह संदेश देता है कि
झूठी एफआईआर दर्ज कराना एक गंभीर अपराध है। निर्दोष व्यक्तियों को फंसाने वालों पर अब कानूनी कार्रवाई अनिवार्य होगी।पुलिस और जांच एजेंसियों को निष्पक्षता और जिम्मेदारी के साथ काम करना होगा। यह निर्णय आपराधिक न्याय प्रणाली में संतुलन,जवाबदेही और कानून के दुरुपयोग पर रोक लगाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है ।