Bureau Report/ Rajiv Tripathi /Mithora News 18 Plus /Co-Editor
मिठौरा ब्लॉक के नदुआ गांव में राष्ट्रीय पल्स पोलियो अभियान पर उठे सवाल, जांच और कार्रवाई की मांग?
महराजगंज जनपद के मिठौरा विकास खंड अंतर्गत ग्राम पंचायत नदुआ में राष्ट्रीय पल्स पोलियो अभियान के संचालन को लेकर स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में आ गई है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि कुछ स्वास्थ्यकर्मियों ने बच्चों को पोलियो की खुराक पिलाए बिना ही घरों के बाहर अभियान संबंधी चिन्ह अंकित कर रिकॉर्ड पूरा कर दिया।
ग्रामीणों का कहना है कि केंद्र और राज्य सरकार पोलियो उन्मूलन के लिए वर्षों से करोड़ों रुपये खर्च कर “दो बूंद जिंदगी की” अभियान चला रही है, ताकि पांच वर्ष तक का कोई भी बच्चा पोलियो की खुराक से वंचित न रहे। लेकिन नदुआ गांव में इस अभियान की गंभीरता को नजरअंदाज किए जाने का आरोप सामने आया है।
आरोप है कि गांव स्थित मिश्रा भवन के मुख्य द्वार पर स्वास्थ्य विभाग की टीम ने अभियान के निर्धारित चिन्ह बना दिए, जिससे यह प्रतीत हो रहा था कि घर के बच्चों को पोलियो की दवा पिला दी गई है। जबकि परिवार का दावा है कि उनके यहां पांच वर्ष से कम आयु की बच्ची होने के बावजूद किसी भी स्वास्थ्यकर्मी ने दवा नहीं पिलाई।
इस घटना के बाद ग्रामीणों में भारी नाराजगी है। उनका कहना है कि यदि कागजों में अभियान पूरा दिखाने के लिए इस तरह की लापरवाही की गई, तो कई बच्चे जीवनरक्षक पोलियो खुराक से वंचित रह सकते हैं। यह केवल सरकारी अभियान की विफलता ही नहीं, बल्कि बच्चों के स्वास्थ्य के साथ गंभीर खिलवाड़ भी है।
ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषी कर्मचारियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि जनकल्याणकारी योजनाएं तभी सफल होंगी, जब उन्हें ईमानदारी और जवाबदेही के साथ लागू किया जाएगा।
स्वास्थ्य विभाग का पक्ष भी सवालों के घेरे में
मामले में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मिठौरा के अधीक्षक डॉ. दयानंद सिंह से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनका पक्ष नहीं मिल सका। जिम्मेदार अधिकारी का फोन न उठाना भी स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर सवाल खड़े करता है।
वहीं, मुख्य चिकित्सा अधिकारी नवनाथ प्रसाद ने बताया कि पोलियो अभियान के तहत पांच वर्ष तक के बच्चों को दवा पिलाई जा रही है। उन्होंने कहा कि यदि किसी घर का बच्चा छूट जाता है तो वहां ‘X’ का निशान लगाया जाता है और अगले दिन दवा पिलाई जाती है। उन्होंने यह भी संभावना जताई कि संबंधित घर में पांच वर्ष से कम आयु का बच्चा न रहा हो।
हालांकि, शिकायतकर्ता ने इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि उनके घर में पांच वर्ष से कम आयु की बच्ची मौजूद है और उसे पोलियो की दवा नहीं पिलाई गई। इतना ही नहीं, उनके घर पर ‘X’ का निशान भी नहीं बनाया गया।
अब यह मामला पूरे स्वास्थ्य विभाग में चर्चा का विषय बना हुआ है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस गंभीर शिकायत की निष्पक्ष जांच होगी और दोषियों पर कार्रवाई होगी, या फिर यह मामला भी सरकारी फाइलों में दबकर रह जाएगा? यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि राष्ट्रीय पल्स पोलियो अभियान की विश्वसनीयता पर भी बड़ा सवाल होगा।