काष्ठ प्रतिमा पर श्रेय की सियासत! असली शिल्पकार पीछे, राजनीतिक चेहरे की सुर्खियां आगे? सिसवां में कला के सम्मान पर उठे सवाल, ओबरी के दयानंद विश्वकर्मा की मेहनत को लेकर सोशल मीडिया पोस्ट से छिड़ा विवाद।

न्यूज़ 18प्लस ब्यूरो/महराजगंज

 

महराजगंज। सिसवां विधानसभा क्षेत्र की सियासत में श्रेय लेने की होड़ को लेकर नया विवाद सामने आया है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को भेंट की गई अद्वितीय काष्ठ प्रतिमा को लेकर सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट ने कलाकार के सम्मान और राजनीतिक प्रचार के बीच की रेखा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि ओबरी निवासी कुशल शिल्पकार दयानंद विश्वकर्मा की मेहनत से तैयार प्रतिमा का श्रेय गौरी शंकर गुप्त उर्फ ‘फौजी भैया’ के नाम से प्रचारित किया गया।

कलाकार की मेहनत पर सियासत का साया?

 

सोशल मीडिया पर प्रसारित पोस्ट में गौरी शंकर गुप्त द्वारा लखनऊ में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव से मुलाकात कर काष्ठ प्रतिमा भेंट करने का दावा किया गया। पोस्ट के अनुसार, इस भेंट के जरिए पार्टी के प्रति प्रतिबद्धता प्रदर्शित की गई। हालांकि, प्रतिमा के वास्तविक निर्माणकर्ता दयानंद विश्वकर्मा को लेकर उठे सवालों ने पूरे मामले को चर्चा में ला दिया है।

 

स्थानीय स्तर पर सामने आई जानकारी के अनुसार, ओबरी निवासी शिल्पकार दयानंद विश्वकर्मा ने इस प्रतिमा को तैयार करने में अपनी कला और मेहनत का योगदान दिया। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि किसी कलाकार की वर्षों की साधना से तैयार कलाकृति को सार्वजनिक मंच पर प्रस्तुत करते समय उसके वास्तविक सृजनकर्ता का नाम क्यों नहीं प्रमुखता से सामने आया?

 

श्रेय किसका, प्रचार किसका?

 

काष्ठ शिल्प केवल लकड़ी तराशने का काम नहीं, बल्कि धैर्य, कौशल और लंबे अभ्यास का परिणाम होता है। दयानंद विश्वकर्मा जैसे स्थानीय कलाकारों के लिए उनकी बनाई कलाकृति ही उनकी पहचान और सम्मान का आधार होती है। ऐसे में यदि किसी राजनीतिक मुलाकात या सोशल मीडिया प्रचार में कलाकार की भूमिका गौण कर दी जाती है, तो यह कला और कलाकार के सम्मान से जुड़ा गंभीर सवाल बन जाता है।

 

विवाद का केंद्र यही है कि प्रतिमा तैयार करने वाले शिल्पकार का नाम सार्वजनिक चर्चा में कितना सामने आया और राजनीतिक प्रचार में किसे प्रमुखता मिली। हालांकि, वायरल पोस्ट के पीछे की पूरी परिस्थितियों और संबंधित पक्षों की मंशा की स्वतंत्र पुष्टि अभी अपेक्षित है।

 

नेतृत्व और जनता के सामने पारदर्शिता का सवाल

 

राजनीतिक क्षेत्र में किसी कलाकृति को भेंट करना सम्मान और संवाद का माध्यम हो सकता है, लेकिन उसके निर्माणकर्ता की पहचान स्पष्ट करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि किसी कलाकार के योगदान को पर्याप्त स्थान नहीं मिलता, तो इससे स्थानीय प्रतिभाओं के प्रोत्साहन और सम्मान की व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं।

 

सिसवां क्षेत्र की जनता के बीच अब यह चर्चा है कि स्थानीय कलाकारों के हुनर को राजनीतिक मंचों पर किस तरह प्रस्तुत किया जाना चाहिए। क्या किसी कलाकृति को भेंट करने वाला व्यक्ति और उसे बनाने वाला कलाकार—दोनों की भूमिका समान रूप से स्पष्ट नहीं होनी चाहिए?

 

दयानंद विश्वकर्मा को मिले पहचान और सम्मान

 

ओबरी के शिल्पकार दयानंद विश्वकर्मा की कला को लेकर उठे इस विवाद ने एक बड़े सवाल को जन्म दिया है—क्या स्थानीय हुनरमंदों को उनकी मेहनत का उचित श्रेय और पहचान मिल रही है?

 

राजनीतिक प्रचार से इतर, कलाकार की मेहनत को सामने लाना और उसे सम्मान देना समाज की जिम्मेदारी भी है। सिसवां की सियासत में उठे इस श्रेय विवाद के बीच अब निगाहें संबंधित पक्षों के स्पष्टीकरण पर टिकी हैं।

 

खबर में लगाए गए श्रेय संबंधी आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि तथा दयानंद विश्वकर्मा और गौरी शंकर गुप्त का पक्ष प्राप्त किया जाना शेष है। दोनों पक्षों का पक्ष मिलने पर उसे प्रमुखता से प्रकाशित किया जा सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *