*ठूठीबारी कोतवाली का ‘काराखास सिस्टम’ सवालों के घेरे में खबर चलने के बाद मिलने लगी धमकियां, व्हाट्सएप कॉल से बढ़ा दबाव!*

Bureau Report /Dilip Kumar Pandey Thuthibari/ Correspondent /News 18 Plus

 

महराजगंज। भारत-नेपाल सीमा पर स्थित कोतवाली ठूठीबारी इन दिनों एक बार फिर चर्चाओं में है। काराखास को लेकर प्रकाशित खबर के बाद अब अज्ञात लोगों द्वारा लगातार व्हाट्सएप कॉल कर धमकी दिए जाने का मामला सामने आया है। सूत्रों के अनुसार खबर प्रकाशित होने के बाद कई संदिग्ध नंबरों से संपर्क कर दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है।

 

मामला उस पुराने विवाद से भी जुड़ा बताया जा रहा है, जब संबंधित काराखास की तैनाती निचलौल थाने में थी। उस दौरान नेपाल सीमा के भीतर जाने और एक कथित अपराधी को पकड़ने का वीडियो वायरल हुआ था। जानकारी के मुताबिक उस समय संबंधित काराखास ने खुद स्वीकार किया था कि वह “मुजरिम पकड़ने नेपाल गया था” और यह कार्रवाई “कप्तान व थानाध्यक्ष के आदेश” पर की गई थी। उस समय जनपद के पुलिस अधीक्षक सोमेंद्र मीना थे।

 

हालांकि बड़ा सवाल यह है कि आखिर भारतीय पुलिस का कोई अधिकारी सीधे नेपाल की सीमा में जाकर गिरफ्तारी कैसे कर सकता है? नेपाल एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र है, जहां कानून व्यवस्था और गिरफ्तारी का अधिकार केवल नेपाल पुलिस को प्राप्त है। अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार यदि कोई आरोपी नेपाल में छिपा हो तो भारतीय पुलिस को नेपाल पुलिस से समन्वय स्थापित करना पड़ता है। स्थानीय स्तर पर सूचना उच्चाधिकारियों के माध्यम से नेपाल प्रशासन तक पहुंचाई जाती है, उसके बाद कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई होती है।

 

सूत्रों का यह भी आरोप है कि कोतवाली में काराखास की भूमिका सिर्फ दफ्तर तक सीमित नहीं रहती, बल्कि थाने के कई विवादित मामलों में उनकी सीधी दखल रहती है। आरोप है कि सुलहनामा से लेकर मुकदमा दर्ज कराने या रोकने तक, हर मामले में वही “मैनेजमेंट” संभालते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि थाने में आने वाले फरियादियों पर भी कई बार दबाव बनाया जाता है और कई मामलों में काराखास ही अंतिम निर्णय कराने वाले व्यक्ति बन जाते हैं।

 

सीमा क्षेत्र में पहले से ही अवैध कारोबार, तस्करी और प्रभावशाली नेटवर्क की चर्चाएं होती रही हैं। ऐसे में काराखास व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवाल पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर रहे हैं। अब देखना यह होगा कि संबंधित मामले में उच्चाधिकारी जांच कराते हैं या फिर पूरा मामला फाइलों में दबकर रह जाएगा।

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