न्यूज़ 18प्लस ब्यूरो/ठूठीबारी
महराजगंज। भारत-नेपाल सीमा से सटे ठूठीबारी थाना क्षेत्र में पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर चर्चाएं एक बार फिर तेज हो गई हैं। स्थानीय स्तर पर पुलिसकर्मी बलवंत यादव की लंबे समय से एक ही क्षेत्र में तैनाती और उनकी कथित प्रभावशाली भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इसी बीच पवन यादव पर लोगों को धमकी दिलवाने के आरोपों की चर्चा ने मामले को और गंभीर बना दिया है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
स्थानीय लोगों के बीच चल रही चर्चाओं के मुताबिक, पवन यादव को बलवंत यादव का करीबी बताया जा रहा है। आरोप है कि उनके माध्यम से कुछ लोगों को धमकी दिलवाने का प्रयास किया जा रहा है। यदि यह शिकायतें सही हैं तो यह न केवल आमजन की सुरक्षा, बल्कि पुलिस की निष्पक्ष कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। ऐसे आरोपों की सच्चाई निष्पक्ष जांच के बाद ही सामने आ सकती है।
एक ही क्षेत्र में लगातार जिम्मेदारी, उठे सवाल
स्थानीय चर्चाओं के अनुसार, बलवंत यादव पहले करीब दो वर्षों तक डायल-112 में तैनात रहे। इसके बाद लगभग दो वर्षों से ठूठीबारी थाना क्षेत्र में ही उनकी सक्रियता बताई जा रही है। अब कस्बा इंचार्ज की जिम्मेदारी से जुड़ने के बाद उनकी भूमिका को लेकर चर्चाएं और तेज हो गई हैं।
सवाल यह है कि एक ही सीमावर्ती क्षेत्र में लंबे समय तक जिम्मेदारियां मिलने का आधार क्या है? क्या यह सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा है, या फिर किसी विशेष भरोसे और कार्यक्षमता के कारण उन्हें लगातार जिम्मेदारी दी जा रही है? इन सवालों का जवाब पुलिस विभाग के उच्चाधिकारियों की ओर से ही स्पष्ट हो सकता है।
‘कारखास’ की चर्चा ने बढ़ाई हलचल
ठूठीबारी क्षेत्र में बलवंत यादव को लेकर स्थानीय स्तर पर ‘कारखास’ होने की चर्चाएं भी सामने आती रही हैं। पुलिस की बोलचाल में कारखास शब्द ऐसे पुलिसकर्मी के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जिसे थाना प्रभारी का भरोसेमंद माना जाता है और जिसकी थाना क्षेत्र में प्रभावी भूमिका होने की चर्चा रहती है।
हालांकि, कारखास कोई आधिकारिक पुलिस पद नहीं है। बलवंत यादव को इस भूमिका में आधिकारिक रूप से नियुक्त किए जाने की कोई पुष्टि उपलब्ध नहीं है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि स्थानीय स्तर पर यह चर्चा किस आधार पर चल रही है और उनकी वास्तविक जिम्मेदारी क्या है।
पवन यादव पर धमकी दिलवाने के आरोपों की हो जांच
स्थानीय स्तर पर पवन यादव का नाम कथित धमकी दिलवाने के आरोपों से जोड़ा जा रहा है। आरोपों के मुताबिक, कुछ लोगों को दूसरों का हवाला देकर डराने-धमकाने का प्रयास किया गया। इन आरोपों को लेकर संबंधित लोगों से शिकायतें सामने आती हैं तो पुलिस प्रशासन को उनकी निष्पक्ष जांच करानी चाहिए।
यह भी स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि किसी व्यक्ति पर लगाए गए आरोप जांच के बिना सिद्ध नहीं माने जा सकते। यदि धमकी देने या दिलवाने की शिकायतें प्राप्त हुई हैं, तो उनके बयान, उपलब्ध साक्ष्य और संबंधित परिस्थितियों की जांच से ही सच्चाई सामने आएगी।
थानाध्यक्ष की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल
ठूठीबारी थाने की कार्यप्रणाली को लेकर स्थानीय स्तर पर थानाध्यक्ष अमित सिंह की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। चर्चा है कि थाना प्रभारी के स्थानांतरण के बाद भी कुछ पुलिसकर्मियों का प्रभाव क्षेत्र में बना हुआ है।
हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि बलवंत यादव को वर्तमान जिम्मेदारी किस प्रशासनिक आदेश और आधार पर मिली है। न ही यह स्वतंत्र रूप से पुष्ट है कि थानाध्यक्ष या किसी अन्य अधिकारी ने कथित धमकी दिलवाने में कोई भूमिका निभाई है। इसलिए इन आरोपों की सच्चाई विभागीय जांच के माध्यम से ही सामने आ सकती है।
सीमावर्ती क्षेत्र में पुलिस व्यवस्था की समीक्षा जरूरी
भारत-नेपाल सीमा से सटे ठूठीबारी क्षेत्र में कानून-व्यवस्था, आमजन की सुरक्षा और कथित तस्करी पर प्रभावी नियंत्रण पुलिस की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। ऐसे संवेदनशील क्षेत्र में पुलिसकर्मियों की तैनाती, बीट व्यवस्था और जिम्मेदारियों की निष्पक्ष समीक्षा समय-समय पर होना जरूरी है।
यदि किसी पुलिसकर्मी की भूमिका निर्धारित जिम्मेदारियों से अलग प्रभावशाली पाई जाती है, तो उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। वहीं यदि लगाए जा रहे आरोप निराधार हैं तो जांच के माध्यम से स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए, ताकि पुलिस विभाग की छवि और आमजन का विश्वास बना रहे।
उच्चाधिकारियों से निष्पक्ष जांच की मांग
स्थानीय चर्चाओं और सामने आ रहे आरोपों के बीच पुलिस के उच्चाधिकारियों से मांग उठ रही है कि ठूठीबारी थाना क्षेत्र में लंबे समय से तैनात पुलिसकर्मियों की भूमिका, कथित कारखास व्यवस्था और पवन यादव पर लगाए जा रहे धमकी दिलवाने के आरोपों की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
अब देखना यह है कि पुलिस प्रशासन इन चर्चाओं को महज अफवाह मानकर नजरअंदाज करता है या फिर मामले की वास्तविकता सामने लाने के लिए जांच कराता है। जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि आरोपों में कितनी सच्चाई है और पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर उठ रहे सवालों का वास्तविक आधार क्या है।