ट्रांसफर हुआ तो फिर उसी थाने में वापसी कैसे? निलेश पांडेय, पवन यादव और अभिमन्यु खरवार की ‘दस दिन में वापसी’ ने खड़े किए बड़े सवाल!

न्यूज़ 18प्लस ब्यूरो/महराजगंज

 

ठूठीबारी, पनियरा और नौतनवां की तैनाती पर उठी उंगलियां, संशोधन आदेश सार्वजनिक करने की मांग।

 

 

 

महराजगंज। जनपद पुलिस में स्थानांतरण की प्रक्रिया को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने विभागीय पारदर्शिता पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। चर्चा है कि ठूठीबारी में निलेश पांडेय, पनियरा में पवन यादव और नौतनवां में अभिमन्यु खरवार का स्थानांतरण किए जाने के बाद करीब दस दिनों के भीतर ही उनकी वापसी उन्हीं थाना क्षेत्रों में हो गई।

 

स्थानांतरण के बाद इतनी जल्दी पुरानी तैनाती पर वापसी ने कई सवालों को जन्म दे दिया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसा कौन-सा प्रशासनिक कारण सामने आया, जिसके चलते स्थानांतरण के फैसले के कुछ ही दिनों बाद तीनों पुलिसकर्मियों को फिर उन्हीं महत्वपूर्ण थाना क्षेत्रों में तैनाती मिल गई?

 

तीन नाम, तीन थाने और एक जैसा सवाल

 

निलेश पांडेय—ठूठीबारी, पवन यादव—पनियरा और अभिमन्यु खरवार—नौतनवां। तीनों नाम अब स्थानांतरण के बाद हुई कथित त्वरित वापसी को लेकर चर्चा के केंद्र में हैं। मामला महज तैनाती का नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया का है जिसके तहत स्थानांतरण के बाद निर्णय बदला गया।

 

यदि प्रशासनिक आवश्यकता के चलते पहले आदेश में संशोधन किया गया है, तो संबंधित लिखित संशोधन आदेश अथवा पुनः तैनाती आदेश ही पूरे मामले की तस्वीर साफ कर सकता है।

 

आदेश बदला तो दस्तावेज कहां है?

 

स्थानांतरण आदेश जारी होने के बाद उसी कर्मचारी को पुनः उसी स्थान पर तैनात करने का निर्णय लिया गया है तो उसका आधार क्या है? क्या पुलिस अधीक्षक कार्यालय से बाकायदा संशोधित आदेश जारी हुआ? क्या उसमें कारण दर्ज किया गया? और क्या वह आदेश विभागीय अभिलेखों में उपलब्ध है?

 

इन सवालों का जवाब सामने आना इसलिए जरूरी है, क्योंकि मौखिक निर्देशों की चर्चा के बजाय लिखित सरकारी आदेश ही प्रशासनिक निर्णय का ठोस आधार माना जाता है।

 

मलाईदार थानों’ की चर्चा ने बढ़ाई हलचल

 

ठूठीबारी, पनियरा और नौतनवां जैसे महत्वपूर्ण थाना क्षेत्रों में तैनाती को लेकर पहले से चर्चाएं होती रही हैं। ऐसे में स्थानांतरण के महज कुछ दिनों बाद कथित रूप से उसी स्थान पर वापसी की खबर ने इन चर्चाओं को और हवा दे दी है।

 

हालांकि किसी भी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ अनियमितता अथवा किसी अनुचित लाभ का आरोप बिना प्रमाण तथ्य के रूप में नहीं माना जा सकता, लेकिन विभाग के सामने पारदर्शिता से जुड़े सवाल जरूर खड़े होते हैं।

 

अब एसपी कार्यालय के दस्तावेज बताएंगे असली तस्वीर

 

अब पूरा मामला इस बात पर टिक गया है कि निलेश पांडेय, पवन यादव और अभिमन्यु खरवार की पुनः तैनाती के संबंध में कोई स्पष्ट लिखित संशोधन आदेश जारी हुआ था या नहीं।

 

यदि आदेश मौजूद है तो उसे सामने लाकर तमाम सवालों का जवाब आसानी से दिया जा सकता है। लेकिन यदि स्थानांतरण के बाद पुनः तैनाती बिना स्पष्ट लिखित आदेश के हुई है, तो यह विभागीय स्थानांतरण प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करेगा।

 

अब सवाल सिर्फ तीन पुलिसकर्मियों की वापसी का नहीं, बल्कि यह है कि स्थानांतरण के आदेश आखिर कितने प्रभावी हैं और उन्हें बदलने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *