न्यूज़ 18प्लस ब्यूरो/निचलौल
बिजली बिल में ₹86 हजार का खेल? पहले ₹88,342 बकाया, बाद में ₹1,754!
महराजगंज। निचलौल विद्युत उपकेंद्र से जुड़े एक उपभोक्ता के बिजली बिल में सामने आए भारी अंतर ने विभागीय बिलिंग व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उपभोक्ता प्रहलाद के खाते में एक समय ₹88,342 की देनदारी दर्ज दिखाई गई, जबकि बाद में उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड के ऑनलाइन पोर्टल पर उसी खाते की देय राशि महज ₹1,754 प्रदर्शित होने लगी। यानी दोनों राशियों के बीच ₹86,588 का अंतर सामने आया है।
मामला यहीं खत्म नहीं होता। आरोप है कि भारी बकाये के आधार पर उपभोक्ता के खिलाफ धारा 135(बी) के तहत एफआईआर दर्ज की गई। इसके बाद कथित रूप से करीब ₹26 हजार के आसपास की राशि की रसीद काटी गई और उपभोक्ता से अधिक रकम लिए जाने का आरोप लगाया गया। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि बिल में संशोधन कथित तौर पर विभागीय लॉगिन/उपयोगकर्ता आईडी के माध्यम से किया गया।
पहले ₹88,342, बाद में ₹1,754—आखिर इतनी बड़ी रकम कहां गई?
जानकारी के अनुसार विद्युत कनेक्शन संख्या 8177636000 पर पहले ₹88,342 का बिल प्रदर्शित हुआ था, जिसकी नियत तिथि 13 सितंबर 2025 बताई गई। भारी-भरकम बकाया सामने आने के बाद उपभोक्ता के सामने भुगतान को लेकर परेशानी खड़ी हो गई।
बाद में ऑनलाइन पोर्टल पर खाते की स्थिति देखने पर देय राशि में चौंकाने वाला बदलाव दिखाई दिया। संशोधित स्थिति में कुल देय बिल ₹1,754 प्रदर्शित हुआ, जिसकी नियत तिथि 11 नवंबर 2025 बताई गई।
बिल संशोधन सामान्य प्रक्रिया या कुछ और?
बिजली बिल में मीटर रीडिंग, बिलिंग त्रुटि अथवा विभागीय जांच के बाद संशोधन होना संभव है। लेकिन इस मामले में ₹88,342 से घटकर ₹1,754 की राशि प्रदर्शित होने का कारण क्या था, यह सबसे बड़ा सवाल है। यदि बिल में गलती थी तो उसे किस अधिकारी ने, किस आधार पर और किस प्रक्रिया के तहत संशोधित किया—इसकी स्पष्ट जानकारी सामने आना जरूरी है।
उपभोक्ता की ओर से यह भी आरोप लगाया गया है कि बिल कम कराने के नाम पर विभागीय स्तर पर कथित रूप से रकम ली गई। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।
बड़े बाबू और एक्सईएन की भूमिका की जांच की मांग
शिकायत में लाल बिहारी, बड़े बाबू तथा एक्सईएन स्तर के अधिकारियों/कर्मचारियों की भूमिका की जांच कराने की मांग की गई है। आरोप है कि संबंधित यूजर आईडी के माध्यम से बिल में बदलाव किया गया। ऐसे में यह जांच का विषय है कि खाते में संशोधन किस लॉगिन से हुआ, किस अधिकारी ने स्वीकृति दी और संशोधन के पीछे क्या दस्तावेज या आधार मौजूद था।
उच्चस्तरीय जांच से सामने आ सकता है सच
मामले में उपभोक्ता ने उच्च अधिकारियों से निष्पक्ष और तकनीकी जांच कराने की मांग की है। जांच में बिल बनने से लेकर संशोधन तक की पूरी डिजिटल हिस्ट्री, मीटर रीडिंग, भुगतान रसीद, एफआईआर से संबंधित अभिलेख और संबंधित यूजर आईडी की गतिविधियों की जांच की जाए तो वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि ₹88,342 का बकाया सही था तो बाद में ₹1,754 कैसे रह गया और यदि ₹1,754 ही सही देय राशि थी तो पहले ₹88,342 का बिल किस आधार पर बनाया गया? इस पूरे मामले में विभागीय जांच और जवाबदेही तय होने का इंतजार है।