आश्वासन के 48 घंटे बाद ही बदल गया पुलिस का रुख! दो दिन के धरने के बाद कार्रवाई का भरोसा, अब थाने पर पंचायत—दो महीने तक पुलिस क्यों रही खामोश?

न्यूज़ 18प्लस ब्यूरो/परसा मलिक

 

महराजगंज। परसा मलिक थाना क्षेत्र के जिगिना गांव में भैंस प्रकरण को लेकर पुलिस की कार्यशैली एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। भैंस मारे जाने के मामले में मुकदमा दर्ज न होने, विदेश गए ग्रामीणों को शांति भंग के तहत पाबंद किए जाने और गांव में नोटिस भेजे जाने से नाराज ग्रामीणों ने पुलिस के खिलाफ दो दिन तक चौराहे पर धरना दिया था। ग्रामीणों के बढ़ते आक्रोश को देखते हुए उच्चाधिकारियों के निर्देश पर थानाध्यक्ष परसा मलिक मौके पर पहुंचे और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का आश्वासन देकर सोमवार को धरना समाप्त कराया।

 

लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि कार्रवाई का यह आश्वासन महज 48 घंटे में ही बदल गया।

 

बुधवार को दोनों पक्षों के लोगों को थाने पर बुलाकर पंचायत कराए जाने की बात सामने आई। ग्रामीणों का कहना है कि यदि पंचायत के जरिए ही मामले का समाधान किया जाना था तो आखिर पिछले दो महीनों से पुलिस ने मामले को गंभीरता से क्यों नहीं लिया? घटना के बाद ही दोनों पक्षों को बैठाकर विवाद का समाधान कराने की पहल क्यों नहीं की गई?

 

दो महीने की खामोशी पर उठ रहे सवाल

 

ग्रामीणों का आरोप है कि जिगिना और गंगवलिया गांव के बीच लंबे समय से तनाव की स्थिति बनी हुई थी। इसके बावजूद पुलिस की ओर से समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाया गया। अब धरना और विरोध के बाद अचानक पंचायत की पहल किए जाने से पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं।

 

ग्रामीणों के बीच यह चर्चा भी तेज है कि आखिर ऐसी कौन-सी वजह रही कि पुलिस ने दो महीने तक मामले को लंबित रखा और विरोध-प्रदर्शन के बाद ही सक्रिय हुई।

 

विदेश गए ग्रामीणों को नोटिस देने पर भी नाराजगी

 

ग्रामीणों ने विदेश में रह रहे कुछ लोगों को शांति भंग के मामले में पाबंद किए जाने पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि संबंधित लोग घटना के समय गांव में मौजूद ही नहीं थे तो उनके खिलाफ कार्रवाई का आधार क्या रहा? ग्रामीणों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की है।

 

पुलिस क्या संदेश देना चाहती है?

 

मामले ने पुलिस की कार्यशैली को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि किसी विवाद में समय रहते पुलिस हस्तक्षेप करे तो मामला बढ़ने से रोका जा सकता है। लेकिन लंबे समय तक चुप्पी के बाद अचानक सक्रियता और फिर पंचायत की प्रक्रिया शुरू होने से लोगों में असंतोष है।

 

हालांकि पंचायत के जरिए विवाद का समाधान निकलता है या मामला फिर किसी नए मोड़ पर पहुंचता है, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा। फिलहाल ग्रामीणों की निगाह पुलिस की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई है।

 

थानाध्यक्ष बोले—पंचायत में पुलिस की कोई भूमिका नहीं

 

इस संबंध में थानाध्यक्ष परसा मलिक विवेक सिंह से बात की गई तो उन्होंने कहा कि थाने के बाहर गांव के लोग आपस में पंचायत कर रहे हैं। पुलिस का उसमें कोई रोल नहीं है। उन्होंने कहा, “आप जो उचित समझें लिखें, आप स्वतंत्र हैं।”

 

अब सवाल यह है कि यदि पुलिस की भूमिका नहीं है तो दो दिन के धरने के बाद ग्रामीणों को दिए गए कार्रवाई के आश्वासन का क्या हुआ? और यदि मामला दो महीने से पुलिस की जानकारी में था, तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई? इन्हीं सवालों को लेकर ग्रामीणों में चर्चा तेज है।

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