तीन साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद भी कुर्सी पर जमे रेंजर सुनील राव पर भी लग रहे गंभीर आरोप, आरा मशीनों तक लकड़ी पहुंचाने के कथित खेल की जांच की मांग।
न्यूज़ 18प्लस ब्यूरो/महराजगंज।
महराजगंज के निचलौल वन रेंज में लकड़ी के कथित अवैध कारोबार को लेकर एक बार फिर वन विभाग की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में है। कुछ दिन पहले की बताई जा रही एक घटना में फॉरेस्टर रामफेर का कथित ऑडियो वायरल होने के बाद विभाग में हलचल मचनी चाहिए थी, लेकिन आरोप है कि मामले की जानकारी डीएफओ को दिए जाने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। वायरल ऑडियो में कथित तौर पर दो हजार रुपये लेकर लकड़ी बेचने की बात सामने आने का दावा किया जा रहा है। हालांकि, ऑडियो की सत्यता और पूरे मामले की आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों तक मामला पहुंच चुका है, तो अब तक जांच और कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या विभाग अपने ही कर्मचारियों पर कार्रवाई करने से बच रहा है या फिर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है?
वहीं, निचलौल रेंज के रेंजर सुनील राव की कार्यशैली भी चर्चा में बताई जा रही है। आरोप है कि वन क्षेत्र में पकड़ी जाने वाली लकड़ी को नियमानुसार कार्रवाई के बजाय कथित तौर पर आरा मशीनों तक पहुंचाने का खेल चलता है। स्थानीय स्तर पर यह भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या लकड़ी की बरामदगी के बाद उसकी नीलामी और कानूनी प्रक्रिया का सही ढंग से पालन किया जाता है? इन आरोपों की निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी है।
तीन साल बाद भी कुर्सी पर जमे रहने का मामला चर्चा में
रेंजर सुनील राव के कार्यकाल को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि निर्धारित तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा होने के बावजूद वह उसी कुर्सी पर बने हुए हैं। वहीं, स्थानीय चर्चाओं में उनके लगभग पांच वर्षों से निचलौल रेंज में तैनात रहने की बात भी कही जा रही है। इस संबंध में विभागीय तैनाती अभिलेखों से स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है।
कई कर्मचारियों की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल
स्थानीय स्तर पर यह भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि लकड़ी से जुड़े कथित अनियमित कारोबार में केवल एक कर्मचारी ही नहीं, बल्कि अन्य वनकर्मियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। यदि इन आरोपों में सच्चाई है तो यह वन संपदा की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरे की घंटी है। जंगलों से लकड़ी की अवैध निकासी पर रोक लगाने की जिम्मेदारी जिन कर्मचारियों की है, उन्हीं पर सवाल उठना विभाग की निगरानी व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिह्न है।
अब देखना यह होगा कि डीएफओ इस कथित वायरल ऑडियो का संज्ञान लेकर फॉरेस्टर रामफेर और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच कराते हैं या मामला यूं ही फाइलों में दबकर रह जाता है। यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो वन संपदा को नुकसान पहुंचाने वाले कथित खेल पर अंकुश लगाना मुश्किल हो सकता है।
बड़ा सवाल: जंगल बचाने की जिम्मेदारी जिनके कंधों पर है, अगर उन्हीं की भूमिका सवालों में हो तो वन संपदा की रक्षा आखिर कौन करेगा?