*निचलौल में 32 लाख का ‘मनरेगा पार्क’ संदेह के घेरे में, खलिहान बनी फाइलों में मिट्टी भराई।*

ब्यूरो रिपोर्ट/राकेश त्रिपाठी निचलौल महराजगंज 

प्रधान सम्पादक 

जहां मिट्टी नहीं थी, वहां भी बिल बना — मनरेगा की जड़ों तक पहुंचा सवाल

महाराजगंज/निचलौल जिले के निचलौल ब्लॉक अंतर्गत ग्राम पंचायत भेड़िया में मनरेगा योजना से करीब 32 लाख रुपये की लागत से बने ‘मनरेगा पार्क’ में भारी वित्तीय अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। 85 डिसमिल क्षेत्रफल में निर्मित इस पार्क को लेकर शिकायत मिलते ही प्रशासनिक हलकों में हलचल मच गई है। बुधवार को खंड विकास अधिकारी (बीडीओ) शमा सिंह गठित जांच टीम के साथ स्वयं मौके पर पहुंचकर स्थलीय निरीक्षण करती नजर आईं, जिसके बाद जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे हैं।

खलिहान पर ‘मिट्टी भराई’ का खेल

ग्रामीणों के अनुसार पार्क का निर्माण जिस भूमि पर किया गया, वह वर्षों से खलिहान के रूप में उपयोग होती रही है। यहां गेहूं और धान की मड़ाई होती थी और भूमि पहले से समतल थी। इसके बावजूद ग्राम निधि से 1,34,272 रुपये मिट्टी भराई के नाम पर भुगतान दिखाया गया। ग्रामीण पूछ रहे हैं—जब जमीन पहले से उपयोग योग्य थी, तो मिट्टी भराई की जरूरत आखिर क्यों पड़ी?

एक काम, तीन-तीन एस्टीमेट!

 

जांच में सामने आए आंकड़े वित्तीय गड़बड़ी की ओर इशारा कर रहे हैं। आरोप है कि एक ही कार्य के लिए अलग-अलग मदों से भुगतान किया गया:

 

मनरेगा मद: चार माह में श्रमिकों पर 5.28 लाख रुपये खर्च दिखाया गया।

 

ग्राम निधि: मिट्टी भराई के नाम पर 1.34 लाख रुपये का भुगतान।

 

अतिरिक्त भुगतान: ग्राम निधि से ही 85 हजार रुपये श्रमिकों के नाम पर और खर्च दर्शाया गया।

 

एक ही कार्य के लिए तीन अलग-अलग एस्टीमेट और भुगतान ने वित्तीय हेराफेरी की आशंका को मजबूत कर दिया है।

 

जांच में बीडीओ की मौजूदगी पर सवाल

बताया जा रहा है कि 23 दिसंबर को बीडीओ शमा सिंह ने इस प्रकरण की जांच हेतु पांच सदस्यीय टीम (एडीओ पंचायत, एडीओ सहकारिता, एडीओ आईएसबी, एपीओ एवं तकनीकी सहायक) का गठन किया था। नियमानुसार जांच टीम को स्वतंत्र रूप से जांच कर रिपोर्ट सौंपनी होती है, लेकिन बीडीओ का स्वयं टीम के साथ मौके पर पहुंचना चर्चा का विषय बना हुआ है। स्थानीय लोग इसे जांच को प्रभावित करने की आशंका से जोड़कर देख रहे हैं।

 

जिम्मेदार क्या कहते हैं?

जांच टीम का कहना है कि पार्क के भौतिक स्वरूप, मस्टर रोल, श्रमिकों की वास्तविक उपस्थिति और भुगतान अभिलेखों का मिलान किया जा रहा है। अभिलेखीय सत्यापन के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि निर्माण में कितनी पारदर्शिता बरती गई और अनियमितता की सीमा क्या है।

 

अब निगाहें जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं—क्या मनरेगा पार्क विकास का मॉडल निकलेगा या भ्रष्टाचार की एक और फाइल?

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