Bureau Report /Dilip Kumar Pandey Nichlaul /Correspondent /News 18 Plus
महराजगंज/निचलौल। निचलौल थाना क्षेत्र के ग्राम आर्दौना में 19 जून को हुई कथित मारपीट, लूट और धमकी की घटना अब केवल एक आपराधिक प्रकरण नहीं रह गई है, बल्कि पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रही है। घटना के पंद्रह दिन बाद भी पीड़ित को न्याय नहीं मिलने से लोगों में नाराजगी बढ़ती जा रही है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच क्षेत्राधिकारी (सीओ) निचलौल रविन्द्र कुमार सिंह को सौंपी गई है। हालांकि जांच शुरू हुए दो दिन बीत चुके हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है। ऐसे में पीड़ित परिवार और स्थानीय लोगों के बीच यह सवाल लगातार उठ रहा है कि आखिर कार्रवाई में इतनी देरी क्यों हो रही है।
पीड़ित विशाल गौड़ का आरोप है कि पुरानी रंजिश के चलते कुछ लोगों ने उसकी दुकान में घुसकर लोहे की रॉड से हमला किया, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया। उसका यह भी आरोप है कि हमलावर दुकान के काउंटर में रखे लगभग 35 हजार रुपये लेकर फरार हो गए तथा शिकायत करने पर जान से मारने की धमकी भी दी।
पीड़ित का कहना है कि न्याय की उम्मीद लेकर जब वह थाने पहुंचा तो मुकदमा दर्ज करने के बजाय उस पर तहरीर बदलने का दबाव बनाया गया। उसने थाना प्रभारी सहित कुछ पुलिसकर्मियों के व्यवहार और भूमिका पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। इन आरोपों की सत्यता जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
इसी बीच यह चर्चा भी सामने आई है कि एक पुलिसकर्मी द्वारा इलाज के नाम पर पीड़ित को पांच हजार रुपये दिए गए। यदि ऐसा हुआ है तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह व्यक्तिगत सहायता थी या किसी समझौते की कोशिश? यदि सहायता थी तो उसका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड क्यों नहीं है? इन सभी बिंदुओं पर जांच रिपोर्ट से ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
पीड़ित का कहना है कि वह अपनी मूल शिकायत पर ही कार्रवाई चाहता है और किसी प्रकार से तहरीर बदलने के लिए तैयार नहीं है। उसका यह भी कहना है कि यदि न्याय मिलने में और देरी होती है अथवा उसके साथ कोई अप्रिय घटना घटती है तो इसकी जिम्मेदारी स्थानीय पुलिस प्रशासन की होगी।
घटना के बाद से पीड़ित परिवार आर्थिक संकट से भी जूझ रहा है। परिवार का कहना है कि उनकी आजीविका का मुख्य साधन वही दुकान थी, जहां कथित घटना हुई। ऐसे में न्याय मिलने में हो रही देरी उनकी परेशानी को और बढ़ा रही है।
अब पूरे मामले में निगाहें सीओ स्तर की जांच पर टिकी हैं। यदि जांच निष्पक्ष और तथ्यों के आधार पर होती है तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि पीड़ित के आरोप कितने सही हैं और कहीं पुलिस स्तर पर लापरवाही, अनियमितता या प्रक्रिया में चूक हुई है या नहीं।
सबसे बड़ा सवाल अब भी कायम है—क्या गरीब पीड़ित को समय पर न्याय मिलेगा, या फिर यह मामला भी लंबी जांच और फाइलों के बोझ तले दबकर रह जाएगा?