मनीष सिंह और बलवंत यादव की तैनाती पर सवाल! साढ़े तीन साल से अधिक एक ही थाने में, फिर भी ‘कारखास’ नहीं?

निचलौल और ठूठीबारी में कथित कारखास व्यवस्था पर बहस तेज, पुलिस के जांच निष्कर्ष और जमीनी हकीकत के मिलान की उठी मांग।

न्यूज़ 18प्लस ब्यूरो/नोयडा दिल्ली 

महराजगंज। जिले के निचलौल और ठूठीबारी थानों में आरक्षियों की लंबे समय से तैनाती को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। निचलौल में आरक्षी मनीष सिंह और ठूठीबारी में आरक्षी बलवंत यादव को लेकर चर्चा है। उपलब्ध जानकारी में बलवंत यादव की एक ही थाने में करीब तीन साल दस महीने से तैनाती का दावा किया गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर एक ही थाने में लंबे समय तक तैनाती के पीछे क्या प्रशासनिक आधार है और संबंधित नियमों के तहत इसकी समीक्षा कब हुई?

सरकारी पद नहीं, फिर ‘कारखास’ व्यवस्था पर सवाल क्यों?

यह सही है कि ‘कारखास’ पुलिस विभाग का कोई नियमित सरकारी पदनाम नहीं है। लेकिन यही बात एक अहम सवाल भी खड़ा करती है—यदि ऐसा कोई पद स्वीकृत नहीं है, तो पुलिस थानों में इस शब्द का इस्तेमाल किन परिस्थितियों में होता है?

आम बोलचाल में ‘कारखास’ उस पुलिसकर्मी के लिए कहा जाता है, जिसे थानेदार का विशेष भरोसेमंद कर्मचारी माना जाता है और जो कथित तौर पर सामान्य बीट ड्यूटी से इतर थाने के विशेष कामकाज में सक्रिय रहता है। ऐसी कथित व्यवस्था को लेकर सवाल तब उठते हैं, जब किसी कर्मचारी की भूमिका, जिम्मेदारी और कार्य आवंटन को लेकर पारदर्शिता स्पष्ट न हो।

हालांकि, किसी आरक्षी को कारखास कहना अपने आप में उसके खिलाफ आरोप साबित नहीं करता। इसकी पुष्टि के लिए ड्यूटी चार्ट, बीट आवंटन, संबंधित अभिलेख और स्वतंत्र जांच जरूरी है।

तीन साल दस महीने की तैनाती पर जवाबदेही कौन तय करेगा?

आरक्षी बलवंत यादव की कथित लंबी तैनाती और आरक्षी मनीष सिंह की तैनाती को लेकर विभागीय अभिलेखों के आधार पर स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए। एक आरक्षी कितने समय तक एक ही थाने में रह सकता है, इसका उत्तर लागू पुलिस विभागीय स्थानांतरण आदेशों और नियमों से तय होगा। केवल लंबी तैनाती के आधार पर नियम उल्लंघन घोषित नहीं किया जा सकता।

लेकिन यदि तैनाती की अवधि असामान्य रूप से लंबी है, तो संबंधित अधिकारियों से यह पूछा जाना अनुचित नहीं होगा कि तैनाती आदेश क्या कहते हैं, क्या समय-समय पर समीक्षा हुई और क्या संबंधित पुलिसकर्मी निर्धारित जिम्मेदारियों के अनुसार काम कर रहे हैं?

पुलिस का दावा—कोई कारखास नियुक्त नहीं

प्रकरण की जांच के संबंध में पुलिस का पक्ष है कि संबंधित आरक्षी अपने आवंटित बीट क्षेत्र में नियमानुसार ड्यूटी कर रहा है तथा थाने पर कोई भी कर्मचारी कारखास के रूप में नियुक्त नहीं है। अन्य आरोपों को भी असत्य और निराधार बताया गया है।

अब सवाल यह है कि क्या इस निष्कर्ष को ड्यूटी रजिस्टर, बीट आवंटन और तैनाती आदेशों के आधार पर सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जा सकता है? यदि जांच में सभी प्रक्रियाएं नियमों के अनुरूप पाई गई हैं, तो अभिलेखीय तथ्यों के साथ स्थिति स्पष्ट करने से संदेह दूर हो सकते हैं। वहीं, यदि कोई अनियमितता सामने आती है, तो उसके लिए नियमानुसार जवाबदेही तय होनी चाहिए।

सवाल सीधे पुलिस प्रशासन से

– क्या निचलौल और ठूठीबारी में संबंधित आरक्षियों की तैनाती अवधि का सत्यापन किया गया है?
– क्या उनकी वास्तविक ड्यूटी और बीट आवंटन का नियमित निरीक्षण होता है?
– क्या कथित कारखास व्यवस्था से संबंधित शिकायतों की जांच केवल लिखित जवाब के आधार पर हुई या अभिलेखों का भी परीक्षण किया गया?
– क्या पुलिस प्रशासन लागू स्थानांतरण नियमों और तैनाती आदेशों की स्थिति स्पष्ट करेगा?

पुलिस की विश्वसनीयता केवल आरोपों को खारिज करने से नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच और तथ्यों के आधार पर जवाब देने से मजबूत होती है। निचलौल के मनीष सिंह और ठूठीबारी के बलवंत यादव की तैनाती को लेकर उठे सवालों पर भी यही कसौटी लागू होनी चाहिए। न किसी कर्मचारी को बिना प्रमाण दोषी ठहराया जाए और न ही किसी शिकायत को बिना पर्याप्त जांच के नजरअंदाज किया जाए। जनता को स्पष्ट जवाब मिलना चाहिए और पुलिस व्यवस्था में जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए।

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