Bureau Report/ News 18 Plus /Nichlaul Thuthibari
हाईलाइट्स*
१)एक ही थाने पर 3 साल से जमे हैं आरक्षी मनीष सिंह और बलवंत यादव
२)सोशल मीडिया पर पुलिस के रटे-रटाए जवाब से जनता और पत्रकारों में असंतोष
३)एसपी की कार्यशैली पर खड़े हो रहे सवाल, उच्चाधिकारियों से निष्पक्ष जांच की मांग
महाराजगंज/निचलौल/ठूठीबारी:उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले में कानून व्यवस्था को बनाए रखने की जिम्मेदारी जिन कंधों पर है, वही खाकी अब भ्रष्टाचार और अनौपचारिक सिंडिकेट के चलते सवालों के घेरे में आ गई है। जिले के निचलौल और ठूठीबारी थानों में पुलिस के कुछ आरक्षियों द्वारा ‘कारखास’ की भूमिका निभाते हुए कथित तौर पर अवैध वसूली, अवैध कारोबार की डीलिंग और जनता का उत्पीड़न करने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। हालांकि, जिम्मेदार पुलिस अधीक्षक (SP) स्तर से इस गंभीर मामले में केवल पल्ला झाड़ने वाला जवाब सामने आया है, जिससे प्रशासनिक सुस्ती और उच्चाधिकारियों की कार्यशैली पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।
क्या है पूरा मामला?:
प्राप्त जानकारी के अनुसार, पुलिस विभाग में ‘कारखास’ नाम का कोई आधिकारिक पद नहीं होता है, लेकिन थानों के भीतर थानाध्यक्ष (SO/SHO) के बेहद करीबी कुछ खास आरक्षी इस पद की अनाधिकृत शक्तियों का इस्तेमाल करते हैं। आरोप है कि निचलौल थाने पर आरक्षी मनीष सिंह और ठूठीबारी थाने पर आरक्षी बलवंत यादव पिछले तीन साल से अधिक समय से एक ही स्थान पर जमे हुए हैं और वे इन थानों के ‘राइट हैंड’ यानी कारखास की भूमिका निभा रहे हैं।
स्थानीय लोगों और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन दोनों थानों में ए टू जेड हर तरह की डीलिंग और अवैध कारोबार से जुड़ी वसूली इन्हीं के इशारे पर संचालित हो रही है। जानकारों का कहना है कि नियमतः किसी भी पुलिसकर्मी को एक ही स्थान पर तीन साल से अधिक समय तक तैनात नहीं रखा जाना चाहिए, ताकि भ्रष्टाचार और सांठगांठ को रोका जा सके। बावजूद इसके, इन दोनों आरक्षियों की लंबी तैनाती ने विभाग के अंदरूनी तंत्र पर कई गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।
पुलिस प्रशासन का
गैर-जिम्मेदाराना रुख और एसपी की कार्यशैली की आलोचना:
जब इस गंभीर मामले को लेकर महाराजगंज पुलिस के संज्ञान में बातें लाई गईं और सोशल मीडिया (X हैंडल) के माध्यम से सवाल उठाए गए, तो पुलिस विभाग की तरफ से केवल यह रटा-रटाया जवाब देकर पल्ला झाड़ लिया गया कि “कारखास कोई पद नहीं होता है।”
इस सतही और गैर-जिम्मेदाराना जवाब ने स्थानीय पत्रकारों और आम जनमानस में भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या सिर्फ यह कह देने से कि “कारखास कोई पद नहीं होता,” इन आरक्षियों द्वारा जनता के उत्पीड़न और अवैध वसूली के पाप धुल जाते हैं? पत्रकार और जागरूक नागरिक भी जानते हैं कि यह कोई आधिकारिक पद नहीं है, लेकिन जब कोई पुलिसकर्मी अनौपचारिक रूप से इस भूमिका को अपनाकर जनता के लिए ‘आपदा’ बन जाए, तो पुलिस अधीक्षक (SP) की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे तुरंत संज्ञान लेकर कड़ी कार्रवाई करें। एसपी महोदय द्वारा इस मामले में चुप्पी साधना या इसे दरकिनार करना यह दर्शाता है कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के दावे केवल कागजी साबित हो रहे हैं।
जनता में रोष, उच्चाधिकारियों से हस्तक्षेप की मांग:
एक ही थाने पर तीन-तीन साल से अधिक समय से जमे इन आरक्षियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे थाने की पूरी कमान अपने हाथ में चला रहे हैं। आम जनता थाने जाने से कतराने लगी है क्योंकि न्याय की जगह वहां ‘कारखास’ की डीलिंग और वसूली का खेल आम हो चुका है।
अब देखना यह होगा कि क्या उत्तर प्रदेश के पुलिस के उच्चाधिकारी (जैसे जोन के एडीजी या डीजीपी स्तर के अधिकारी) इस मामले का स्वतः संज्ञान लेते हैं या महाराजगंज पुलिस इसी तरह आंखें मूंदे बैठी रहती है। जनता और प्रबुद्ध वर्ग ने मांग की है कि इन दोनों थानों पर तैनात आरक्षियों को तुरंत हटाया जाए और उनके संपत्तियों व कारनामों की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच कराकर कठोर विभागीय कार्रवाई की जाए।