Bureau Report/ Narsingh Upadhyay Nichlaul /News 18 Plus /Sub Editor
शाम ढलते ही मोहल्लों में सजती ‘नशे की मंडी’, आबकारी विभाग मूकदर्शक — युवाओं का भविष्य दांव पर!
महराजगंज/निचलौल निचलौल तहसील क्षेत्र में रेहायशी इलाकों के बीच कच्ची व देशी शराब की कालाबाजारी अब खुलेआम ‘जहर के कारोबार’ में तब्दील हो चुकी है। सूर्य ढलते ही मोहल्लों और गलियों में शराब व गांजे की बिक्री धड़ल्ले से शुरू हो जाती है, लेकिन जिम्मेदार आबकारी विभाग और स्थानीय पुलिस सिर्फ कागजों में कार्रवाई का दिखावा कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे हैं।
युवाओं पर पड़ रहा सीधा असर
इस अवैध कारोबार का सबसे ज्यादा खामियाजा किशोरों और युवाओं को भुगतना पड़ रहा है। नशे की लत में फंसकर उनका स्वास्थ्य बिगड़ रहा है और भविष्य अंधकारमय होता जा रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि रोजाना नशे में धुत युवक उपद्रव करते हैं, जिससे आम जनमानस में भय और असुरक्षा का माहौल बना हुआ है।
शिकायतें बेअसर, कार्रवाई ‘कब’?
आबकारी निरीक्षक वैभव कुमार यादव से कई बार शिकायत की गई, लेकिन हर बार सिर्फ “कार्यवाही की जाएगी” का आश्वासन ही मिला। सवाल उठता है —
क्या प्रशासन युवाओं की जिंदगी बर्बाद होने का इंतजार कर रहा है?
क्या कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाएगी?
‘संलिप्तता’ के आरोप, सिस्टम पर सवाल
सूत्रों के मुताबिक इस अवैध धंधे में आबकारी विभाग और स्थानीय पुलिस की मिलीभगत तक के आरोप लग रहे हैं। यही वजह है कि खुलेआम चल रहे इस कारोबार पर लगाम नहीं लग पा रही है, और कालाबाजारी करने वालों के हौसले लगातार बुलंद होते जा रहे हैं।
इन गांवों में बनती है कच्ची शराब:
बजहां उर्फ अहिरौली, बजहीं, डोमा, लेदी, गेड़हवां, चंदागुलरभार, बढ़यां, मुसहर टोला समेत कई गांव
कस्बे के इन मोहल्लों में खुली बिक्री:
मारवाड़ी मोहल्ला, महाशय मोहल्ला, हिंदी मोहल्ला, घोड़हवां
सिर्फ दिखावे की कार्रवाई!
स्थानीय लोगों का आरोप है कि आबकारी विभाग केवल उन्हीं मामलों में कार्रवाई दिखाता है, जो सीमा पर एसएसबी द्वारा पकड़े जाते हैं। बाकी क्षेत्रों में चल रही खुलेआम कालाबाजारी पर आंखें मूंद ली जाती हैं।
जनता में आक्रोश, कार्रवाई की मांग नशे के बढ़ते कारोबार से त्रस्त स्थानीय लोगों ने प्रशासन से सख्त कार्रवाई की मांग की है। लोगों का कहना है कि अगर जल्द ठोस कदम नहीं उठाए गए तो हालात और भयावह हो सकते हैं।निचलौल में नशे का यह काला कारोबार अब सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी के अस्तित्व पर संकट बन चुका है। अब देखना यह है कि प्रशासन कब जागता है — या फिर यह ‘जहर का खेल’ यूं ही चलता रहेगा।