*ईरान में उबाल: कट्टरवाद बनाम पहचान की जंग, सड़कों पर उतरी नई पीढ़ी।*

न्यूज रिपोर्ट/ सोमेंद्र द्विवेदी न्यू दिल्ली 

प्रदेश प्रभारी 

कट्टर राज से आज़ादी – पहचान की वापसी”

विशेष रिपोर्ट /मध्य-पूर्व एक बार फिर ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है। जिस देश को आज दुनिया ईरान के नाम से जानती है, वह कभी पर्शिया कहलाता था। यही पर्शिया पारसियों की ऐतिहासिक मातृभूमि रही है। समय के साथ अरब आक्रमणों और धार्मिक परिवर्तन के बाद देश का नाम और शासन व्यवस्था बदली, लेकिन ईरानी समाज के भीतर आज भी पर्शियन पहचान की स्मृति जीवित है।

 

सूत्रों और विश्लेषकों के अनुसार, ईरान में उभर रहा मौजूदा राष्ट्रव्यापी आंदोलन केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और वैचारिक मुक्ति का संघर्ष बनता जा रहा है। खासकर Gen-Z और युवा वर्ग खुलकर यह कहता नजर आ रहा है कि वे कट्टर धार्मिक शासन से निजात चाहते हैं।

 

महिलाओं से शुरू हुआ प्रतिरोध, जनआंदोलन में तब्दील

पिछले वर्ष हिजाब और बुर्का अनिवार्यता के खिलाफ शुरू हुआ महिला आंदोलन अब व्यापक जनांदोलन का रूप ले चुका है।

प्रदर्शन के दौरान महिलाओं द्वारा सार्वजनिक रूप से हिजाब जलाने, बाल काटने और पश्चिमी परिधान अपनाने की घटनाओं ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा था।

 

मानवाधिकार संगठनों और विपक्षी समूहों के अनुसार, इन आंदोलनों के बाद शासन द्वारा कड़ी कार्रवाई की गई। बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां, दमन और कथित मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोप लगाए गए। हालांकि ईरानी सरकार इन आरोपों को सिरे से खारिज करती रही है।

इस बार सड़कों पर पूरा ईरान

वर्तमान हालात में विरोध प्रदर्शन केवल महिलाओं तक सीमित नहीं हैं। छात्र, कामगार, बुद्धिजीवी और आम नागरिक बड़ी संख्या में सड़कों पर उतर आए हैं। कई शहरों में हालात तनावपूर्ण बताए जा रहे हैं। सरकारी और निजी संपत्तियों को नुकसान पहुंचने की खबरें भी सामने आ रही हैं, हालांकि आधिकारिक पुष्टि सीमित है।

 

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह आंदोलन शासन परिवर्तन की मांग की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है।

 

अंतरराष्ट्रीय समीकरण और सत्ता संघर्ष

सूत्रों के मुताबिक, ईरान की आंतरिक अस्थिरता पर अमेरिका और इजरायल की करीबी नजर है। पश्चिमी देशों में ईरान के भविष्य को लेकर कूटनीतिक हलचल तेज बताई जा रही है।

ईरान के पूर्व शाह के पुत्र रज़ा पहलवी के समर्थक विदेशों में सक्रिय हैं और संभावित सत्ता परिवर्तन की चर्चाएं चल रही हैं।

 

वहीं, अरब देशों की ओर से ईरान को खुला समर्थन न मिलने को भी एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।

पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल!

क्षेत्रीय राजनीति में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। विश्लेषकों के अनुसार, यदि पश्चिमी देश ईरान के खिलाफ कोई सैन्य कदम उठाते हैं, तो पाकिस्तान पर रणनीतिक सहयोग का दबाव बढ़ सकता है।

हालांकि पाकिस्तान सरकार या सेना की ओर से ऐसी किसी आधिकारिक पुष्टि से इनकार किया गया है।

 

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि पाकिस्तान क्षेत्रीय ‘भाईचारे’ और वैश्विक दबावों के बीच किस दिशा में खड़ा होता है।

 

 

निष्कर्ष

ईरान में जारी घटनाक्रम केवल एक देश का आंतरिक संकट नहीं, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की राजनीति को प्रभावित करने वाला घटनाक्रम बन चुका है।

यह संघर्ष अब सत्ता बनाम जनता से आगे बढ़कर पहचान, स्वतंत्रता और भविष्य की दिशा तय करने की लड़ाई के रूप में देखा जा रहा है।

आने वाले दिन तय करेंगे कि ईरान कट्टरवाद के वर्तमान ढांचे में बना रहेगा या इतिहास एक बार फिर नया मोड़ लेगा।

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