रीपोर्ट राकेश त्रिपाठी महराजगंज
“जिस दान ने मेवाड़ को आत्मसम्मान दिया, वही भामाशाह की पहचान है”
आज इतिहास के महान दानवीर भामाशाह की पुण्यतिथि है। मेवाड़ की अस्मिता, स्वाभिमान और स्वतंत्रता के संघर्ष को अपने सर्वस्व के दान से नई दिशा देने वाले भामाशाह का नाम भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है।
भामाशाह का जन्म 28 जून 1547 (कुछ इतिहासकार 29 अप्रैल 1547 भी मानते हैं) को राजस्थान के मेवाड़ राज्य के वर्तमान पाली जिले के सादड़ी गांव में एक ओसवाल जैन परिवार में हुआ था। उनके पिता भारमल रणथम्भौर के किलेदार थे। बचपन से ही वे मेवाड़ के शासक महाराणा प्रताप के मित्र, सहयोगी और विश्वासपात्र सलाहकार रहे।
संकट में दिया सर्वस्व
हल्दीघाटी युद्ध के बाद जब महाराणा प्रताप परिवार सहित जंगलों और पहाड़ियों में भटकने को विवश थे, तब भामाशाह ने मातृभूमि की रक्षा को सर्वोपरि मानते हुए अपनी सम्पूर्ण धन-संपदा महाराणा प्रताप को अर्पित कर दी। कहा जाता है कि यह दान इतना विशाल था कि उससे 25 हजार सैनिकों का 12 वर्षों तक निर्वाह संभव हो सका।
इस सहयोग से महाराणा प्रताप में नया उत्साह संचारित हुआ, उन्होंने पुनः सेना संगठित की और मुगल सत्ता को चुनौती देते हुए मेवाड़ का आत्मसम्मान पुनः स्थापित किया। दिल्ली की गद्दी का प्रलोभन ठुकराकर भामाशाह ने यह सिद्ध कर दिया कि उनके लिए स्वदेश और स्वाभिमान सर्वोपरि थे।
दानवीरता की अमर गाथा
भामाशाह की दानशीलता के किस्से उस समय आसपास के क्षेत्रों में प्रेरणा के रूप में सुने-सुनाए जाते थे। उनकी उदारता पर यह पंक्तियाँ आज भी प्रासंगिक हैं—
“वह धन्य देश की माटी है, जिसमें भामा सा लाल पला।
उस दानवीर की यश गाथा को, मेट सका क्या काल भला॥”
तीन पीढ़ियों तक स्वामिभक्ति
भामाशाह की ईमानदारी और निष्ठा का प्रभाव इतना गहरा था कि उनके बाद पुत्र जीवाशाह और फिर पौत्र अक्षयराज को भी मेवाड़ में प्रधान पद पर नियुक्त किया गया। एक ही परिवार की तीन पीढ़ियों ने प्रधान पद पर रहकर मेवाड़ की सेवा की और जैन समाज का गौरव बढ़ाया।
महाराणा स्वरूप सिंह और महाराणा फतेह सिंह द्वारा इस परिवार के सम्मान में विशेष राजाज्ञाएँ भी जारी की गईं।
विरासत और सम्मान
चित्तौड़गढ़ तोपखाना के पास स्थित भामाशाह की हवेली आज जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है।
आबू पर्वत के दिलवाड़ा जैन मंदिर का निर्माण भामाशाह और उनके भाई ताराचंद ने कराया था।
उनके वंशज कावडिंया परिवार आज भी उदयपुर में निवास करता है।
उदयपुर में राजाओं की समाधियों के मध्य भामाशाह की समाधि स्थित है।
31 दिसंबर 2000 को उनके सम्मान में 3 रुपये का डाक टिकट जारी किया गया।
लोकहित और दानशीलता की प्रेरणा को जीवंत रखने के लिए छत्तीसगढ़ शासन ने दानवीर भामाशाह सम्मान स्थापित किया है, जबकि महाराणा मेवाड़ फाउंडेशन द्वारा राजस्थान में मेधावी छात्रों को दानवीर भामाशाह पुरस्कार प्रदान किया जाता है।
दान, त्याग और आत्मसम्मान की त्रिवेणी माने जाने वाले भामाशाह न केवल मेवाड़ बल्कि पूरे भारत के लिए प्रेरणा हैं। आज उनकी पुण्यतिथि पर देश उस महान दानवीर को नमन करता है, जिनके त्याग ने इतिहास की धारा मोड़ दी।