रिपोर्ट राकेश त्रिपाठी प्रधान संपादक
निचलौल वन रेंज में ‘लकड़ी माफिया राज’ : रेंजर की शह पर जंगल की खुली लूट, तेंदुए की मौत पर भी खामोशी
युवती की जान गई, लेकिन वन विभाग ने नहीं उठाया कोई ठोस कदम
जनपद की निचलौल वन रेंज इन दिनों वन सुरक्षा नहीं, बल्कि तस्करों की सुरक्षित पनाहगाह बनती जा रही है। हालात ऐसे हैं कि ‘रक्षक ही भक्षक’ की कहावत पूरी तरह चरितार्थ हो रही है। आरोप है कि वन क्षेत्राधिकारी सुनील कुमार राव की कथित मिलीभगत से खैरा, धूप, चंदन और बेत जैसी बेशकीमती लकड़ियों की तस्करी धड़ल्ले से की जा रही है।
सूत्रों के अनुसार, जंगल से निकली लकड़ी सरकारी कागजातों की आड़ में खुलेआम सीमा पार कराई जा रही है। तस्करों के हौसले इतने बुलंद हैं कि अब नियम-कानून सिर्फ कागजों तक सिमट कर रह गए हैं।
परमिट 500 का, बाहर भेजे गए 700 बंडल
चार दिन पूर्व निचलौल–चिउटहां मार्ग से बेत के 700 बंडल बाहर भेजे गए, जबकि आधिकारिक परमिट सिर्फ 500 बंडलों का ही जारी किया गया था। शेष 200 बंडल कथित तौर पर रेंजर की शह पर बिना किसी रोक-टोक के निकाल दिए गए। यह कोई पहली घटना नहीं है, बल्कि जंगल की संपदा को लंबे समय से सुनियोजित तरीके से लूटा जा रहा है।
तेंदुए का कहर, युवती की मौत… और वन अफसर मौन
जंगल की लूट के साथ-साथ क्षेत्र में वन्यजीवों का खतरा भी लगातार बढ़ रहा है। तीन दिन पूर्व निचलौल क्षेत्र के बलईखोर गांव में एक युवती की तेंदुए के हमले में दर्दनाक मौत हो गई। घटना के बाद से ग्रामीण दहशत में हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि अब तक न तो पिंजरा लगाया गया, न ही गश्त बढ़ाई गई।
ग्रामीणों का आरोप है कि वन क्षेत्राधिकारी ने इस गंभीर घटना पर भी चुप्पी साध रखी है।
नियमों की अनदेखी: 4 साल से एक ही रेंज में तैनात
सरकारी नियमों के अनुसार किसी भी अधिकारी की एक ही स्थान पर तैनाती तीन वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए, लेकिन सुनील कुमार राव पिछले चार वर्षों से निचलौल रेंज में जमे हुए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि लंबे कार्यकाल के कारण ही तस्करों से गठजोड़ मजबूत हुआ और जंगल माफिया बेखौफ हो गया।
पत्रकारों से बदसलूकी के भी आरोप
रेंजर पर यह भी आरोप है कि उनकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने वाले पत्रकारों के साथ अभद्र व्यवहार किया जाता है। सूचना मांगने पर धमकी और तानाशाही रवैया अपनाया जाता है, जिससे मीडिया में भी रोष व्याप्त है।
अब बड़ा सवाल यह है कि
क्या शासन और वन विभाग के उच्चाधिकारी इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराएंगे, या फिर निचलौल का जंगल इसी तरह तस्करों के हवाले होता रहेगा?