Bureau Report/ Dilip Kumar Pandey Maharajganj /News 18 Plus /Correspondent
महराजगंज/निचलौल: उत्तर प्रदेश सरकार की ट्रांसफर नीति और भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ के दावों को निचलौल रेंज में ठेंगा दिखाया जा रहा है। जहां एक ओर प्रशासनिक गलियारों में 3 साल का कार्यकाल पूरा होते ही अधिकारियों के तबादले की सुगबुगाहट शुरू हो जाती है, वहीं निचलौल रेंज के वन क्षेत्राधिकारी (RFO) सुनील कुमार राव पिछले 5 वर्षों से एक ही रेंज में अंगद की तरह पैर जमाए बैठे हैं। कार्यकाल की यह ‘लंबी पारी’ अब क्षेत्र में चर्चा और विवाद का विषय बन गई है।
पकड़ी गई लकड़ी का खेल: जंगल से सीधे आरामशीन तक का सफर
मामला केवल कार्यकाल तक सीमित नहीं है। सूत्रों और स्थानीय मुखबिरों से मिली जानकारी के अनुसार, रेंज में बड़े पैमाने पर धांधली और अवैध वसूली का खेल चल रहा है। सबसे चौंकाने वाला आरोप यह है कि जंगल से जो कीमती लकड़ियां पकड़ी जाती हैं, उनका रिकॉर्ड कभी सरकारी कागजों (चालान) में दर्ज ही नहीं होता। साहब के इशारे पर इन लकड़ियों को डिपो ले जाने के बजाय सीधे आरामशीनों पर उतार दिया जाता है, जिससे सरकारी राजस्व को लाखों का चूना लग रहा है।
“शासन तक है पहुंच”: बेखौफ अंदाज
सूत्रों का दावा है कि जब भी नियमों की बात आती है, तो साहब का रटा-रटाया जवाब होता है कि उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। बताया जा रहा है कि वह अक्सर अपनी ऊंची रसूख और शासन में सीधी पकड़ होने की धौंस जमाते हैं। इसी ‘कथित संरक्षण’ के दम पर रेंज में वसूली का सिंडिकेट जोरों पर संचालित हो रहा है, जिससे ईमानदार कर्मियों और ग्रामीणों में भारी रोष है।
मुख्य बिंदु जो जांच के घेरे में हैं:
स्थानांतरण नीति का उल्लंघन: आखिर किस विशेष परिस्थिति या ‘आशीर्वाद’ के चलते 5 साल से एक ही स्थान पर तैनाती बरकरार है?
राजस्व की हानि: पकड़ी गई लकड़ी को डिपो न भेजकर आरामशीन मालिकों से सांठगांठ कर बेचना गंभीर वित्तीय अपराध है।
अवैध वसूली: रेंजर के संरक्षण में रेंज के भीतर चल रही वसूली की शिकायतों पर उच्चाधिकारी मौन क्यों हैं?
जनता की मांग:
उच्च स्तरीय जांच की दरकार
स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण प्रेमियों ने मुख्यमंत्री और प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) से मांग की है कि इस मामले की गोपनीय जांच कराई जाए। यदि रेंजर के कार्यकाल और संपत्ति की निष्पक्ष जांच होती है, तो कई बड़े खुलासे होने की उम्मीद है।
बड़ा सवाल:
क्या महकमे के आला अधिकारी इस ‘पांच साला कार्यकाल’ और धांधली के दावों पर संज्ञान लेंगे, या रेंजर की ‘शासन में पकड़’ के आगे नियम बौने ही रहेंगे?