Bureau Report /Anubhav Patel Nichlaul /News 18 Plus /Correspondent
● न्याय के मंदिर में पीड़ितों की जगह बिचौलियों का बोलबाला, बिना चढ़ावे के नहीं लिखी जाती रिपोर्ट
● रेस्टोरेंट की आड़ में जिस्मफरोशी का धंधा, थानाध्यक्ष के ‘कारखास’ पर वसूली का आरोप
क्या वरिष्ठ अधिकारी इस ‘दलाल तंत्र’ और ‘वसूली सिंडिकेट’ से अनजान हैं?
‘पुलिस मित्र’ का नारा देने वाली यूपी पुलिस क्या निचलौल में सिर्फ ‘दलालों की मित्र’ बनकर रह गई है?
कस्बे में चल रहे अनैतिक देह व्यापार पर आखिर कब चलेगा कानून का डंडा?
महराजगंज/निचलौल: कहने को तो थाना ‘कानून का मंदिर’ होता है, जहाँ न्याय की उम्मीद में गरीब और मजलूम अपनी फरियाद लेकर आते हैं। लेकिन निचलौल थाने की तस्वीर इसके उलट है। यहाँ न्याय बिकता है और कानून की रक्षा करने वाली वर्दी दलालों की ढाल बन चुकी है। सूत्रों की मानें तो निचलौल थाना अब कानून का मंदिर नहीं, बल्कि दलालों का ‘कॉरपोरेट ऑफिस’ बन चुका है, जहाँ हर अपराध और हर शिकायत की एक तय कीमत है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार दिनांक 30 अप्रैल 2026 को निचलौल थानाक्षेत्र के सिरौली गांव के एक पिता- पुत्र के जमीनी विवाद मामले में निचलौल तहसील में कहासुनी हो गई। पिता पैतृक संपत्ति अपने छोटे बेटे को बेदखल करके बेच रहा था। निचलौल पुलिस बाप बेटे को थाने उठा कर लाई। बाप ने विक्रय संपत्ति में से 2 लाख 50 हजार रुपए हिस्सा तो दिया परन्तु थाने के चहेते आरक्षी फैज खान व दिलीप सिंह पीड़ित रविन्द्र से 50 हजार रुपए धमकी देकर सुलहनामे के नाम पर ऊपर ही ऊपर गटक गए। और तो और पीड़ित द्वारा सुलहनामा पेपर मांगने पर आरक्षी दिलीप सिंह व फैज खान के द्वारा पांच हजार रुपए की और मांग की गई। पीड़ित रविन्द्र न्याय के लिए दर दर भटकता रहा।
दलालों की ‘अदालत’, पुलिस मौन;
स्थानीय लोगों का आरोप है कि थाने के गेट से लेकर अंदर की कुर्सियों तक बिचौलियों का कब्जा है। पीड़ित जब अपनी शिकायत लेकर पहुंचता है, तो पुलिसकर्मी सीधे बात करने के बजाय उसे बाहर खड़े ‘खास आदमियों’ के पास भेज देते हैं। थाने के बाहर चाय की दुकानों और गेट पर जमे ये दलाल ही तय करते हैं कि किसकी एप्लीकेशन लिखी जाएगी और किसकी रद्दी की टोकरी में जाएगी।
रेट कार्ड: मारपीट से लेकर जमीन विवाद तक का सौदा
विश्वस्त सूत्रों ने खुलासा किया है कि थाने में शिकायतों के हिसाब से रेट लिस्ट चलती है:
मामूली मारपीट: 2 से 3 हजार रुपये।
FIR दर्ज कराना: 5 से 10 हजार रुपये।
जमीन विवाद: 20 हजार से ऊपर (विवाद की गंभीरता के अनुसार)।
एक कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इस काली कमाई का हिस्सा सिपाही से लेकर ऊपर तक पहुंचता है। दलाल सिर्फ पैसा इकट्ठा करने का जरिया हैं।
रेस्टोरेंट की आड़ में ‘पाप’ की खेती और ‘कारखास’ का खेल:
चौंकाने वाली बात यह है कि भ्रष्टाचार सिर्फ थाने की फाइलों तक सीमित नहीं है। निचलौल कस्बे में कई नामचीन रेस्टोरेंट्स की आड़ में व दमकी गांव में वेश्यावृत्ति का काला कारोबार धड़ल्ले से फल-फूल रहा है। सूत्र बताते हैं कि इन ठिकानों पर पुलिस की छापेमारी महज एक दिखावा होती है, क्योंकि थानाध्यक्ष के ‘कारखास’ (खास सिपाही) रोजाना या साप्ताहिक आधार पर यहाँ से मोटी वसूली करते हैं। जब रक्षक ही भक्षक बनकर वसूली में जुट जाएं, तो अपराधियों के हौसले बुलंद होना लाजिमी है।
कानून की धज्जियां:
कानून के जानकारों के अनुसार, थाने में दलालों का जमावड़ा पुलिस अधिनियम और IPC की धारा 166 का सीधा उल्लंघन है। यह सीधे तौर पर भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है।