रिपोर्ट ब्यूरो ठूठीबारी/ महराजगंज
हाईलाइट:
– सावन मेले के नाम पर टालमटोल या किसी ‘ऊपरी पहुंच’ का कमाल? महीनों बाद भी रिलीव न होने से महकमे में चर्चाओं का बाजार गर्म
– थाने में तीन साल से जमे आरक्षी बलवंत यादव पर भी उठे गंभीर सवाल; ‘कारखास’ संस्कृति और कथित रसूख से पुलिस की कार्यप्रणाली पर लग रहे ग्रहण
पुलिस विभाग में अनुशासन, प्रशासनिक शुचिता और कानून-व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले स्थानांतरण आदेश जब कागजों तक ही सीमित रह जाएं, तो व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है। महराजगंज जिले के ठूठीबारी थाने से जुड़ा एक ऐसा ही हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जिसने महकमे की कार्यप्रणाली और आंतरिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। एक तरफ जहां प्रशासनिक फेरबदल के तहत अधिकारी गैर जनपद स्थानांतरित हो चुके हैं, वहीं मैदानी हकीकत यह है कि वे अब भी पुरानी कुर्सी पर विराजमान हैं।
कागजों में ट्रांसफर, हकीकत में कुर्सी पर कब्जा!:
सूत्रों के मुताबिक, बीती जुलाई माह के अंतिम सप्ताह में पुलिस महकमे में हुए बड़े प्रशासनिक फेरबदल के दौरान ठूठीबारी थाने की कमान संभाल रहे थानाध्यक्ष अमित सिंह का गैर जनपद स्थानांतरण कर दिया गया था।
शुरुआती दौर में यह तर्क दिया गया था कि ऐतिहासिक इटहिया धाम पर लगने वाले सावन मेले के मद्देनजर कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उन्हें मेला समाप्ति तक रोका गया है। लेकिन सावन मेला समाप्त हुए एक लंबा अरसा बीत चुका है, और अब शरद ऋतु की दस्तक के बावजूद, कागजों में जुलाई माह में ही स्थानांतरित हो चुके थानाध्यक्ष अमित सिंह आज भी ठूठीबारी थाने की कुर्सी पर मजबूती से जमे हुए हैं। इस लंबी लेटलतीफी को लेकर आम जनमानस और पुलिस महकमे के भीतर सुगबुगाहट तेज है कि आखिर एक दरोगा की ऐसी कौन सी पहुंच और पकड़ है, जिसके आगे विभागीय आदेश भी बौने साबित हो रहे हैं।
आरक्षी बलवंत यादव का जलवा: पीआरवी से लेकर थाने तक तीन साल से एक ही ठिकाना:
यह पूरा मामला सिर्फ एक थानाध्यक्ष के इर्द-गिर्द तक सीमित नहीं है, बल्कि थाने के भीतर तैनात एक आरक्षी के बेहिसाब रसूख और लंबी तैनाती ने इस प्रकरण को और गंभीर बना दिया है।
१)एक ही थाने में लंबी पारी: ठूठीबारी थाने में तैनात आरक्षी बलवंत यादव पिछले तीन वर्षों से अधिक समय से लगातार इसी थाने और क्षेत्र में जमे हुए हैं।
२)स्थानांतरण का खेल: हैरानी इस बात की है कि पहले बलवंत यादव यूपी पुलिस ‘112’ (पीआरवी) के जरिए इसी क्षेत्र में सक्रिय थे और बाद में प्रशासनिक फेरबदल के नाम पर उन्हें पीआरवी से हटाकर सीधे ठूठीबारी थाने के मुख्य आरक्षी बल में तैनात कर दिया गया। एक ही थाने में वर्षों से जमे रहने का यह सिलसिला विभागीय नियमों पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।
३)’कारखास’ संस्कृति और गोपनीय संचालन: स्थानीय चर्चाओं के अनुसार, आरक्षी बलवंत यादव को थानाध्यक्ष अमित सिंह का बेहद करीबी यानी ‘कारखास’ माना जाता है। थाने के प्रशासनिक और अन्य मामलों की कथित डीलिंग में उनकी खासी दखलंदाजी बताई जाती है।
४)”साहब का हाथ है”: विभागीय गलियारों में यह चर्चा आम है कि यह आरक्षी बेखौफ अंदाज में शेखी बघारता फिरता है कि “हमारे ऊपर साहब का हाथ है, हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।”
जनता के बीच सुगबुगाहट, क्या सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाएंगे आदेश?:
इस पूरे घटनाक्रम से क्षेत्र के प्रबुद्ध नागरिकों, व्यापारियों और आम जनता में भारी नाराजगी है। लोगों का सवाल है कि यदि शासन और पुलिस उच्चाधिकारियों के आदेशों का पालन इस तरह कागजों तक ही सीमित रहना है, तो पारदर्शी और निष्पक्ष प्रशासन का दावा कैसे मजबूत होगा?
अब देखना यह होगा कि महराजगंज जिले के तेजतर्रार पुलिस अधीक्षक इस पूरे मामले का संज्ञान लेते हैं या नहीं। क्या महकमे की साख बचाने के लिए नियमों को ताक पर रखकर जमे कर्मियों पर कार्रवाई होगी, या फिर तबादले के आदेश यूं ही फाइलों में धूल फांकते रहेंगे?