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बड़े बाबू चंद्रजीत निषाद पर बिल घटाने-बढ़ाने और उपभोक्ताओं से पैसे लेने के गंभीर आरोप, जांच हुई तो खुल सकती है कई परतें!
महराजगंज/निचलौल। निचलौल विद्युत उपकेंद्र में बिजली बिलों को लेकर चल रही चर्चाओं ने अब एक नया मोड़ ले लिया है। उपभोक्ताओं और विभागीय सूत्रों के बीच बड़े बाबू चंद्रजीत निषाद की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि बिजली के बिल घटाने-बढ़ाने का कथित खेल लंबे समय से चल रहा है और इसी के माध्यम से उपभोक्ताओं को कथित तौर पर राहत या अतिरिक्त बोझ देने का काम किया जाता है।
सूत्रों का दावा है कि उपभोक्ताओं के खाते से संबंधित विवरण को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित नहीं किया जा रहा है। चर्चा यह भी है कि यदि उच्चस्तरीय जांच हुई और विभागीय अभिलेखों तथा डिजिटल रिकॉर्ड को खंगाला गया तो बिलों में किए गए कथित बदलावों की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है। बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह खेल कब से चल रहा है और अब तक इसकी जांच क्यों नहीं हुई?
पैसे लेकर बिल घटाने-बढ़ाने का आरोप
मामले को और गंभीर बनाने वाला आरोप यह है कि चंद्रजीत निषाद द्वारा उपभोक्ताओं से पैसे लेकर कथित रूप से कई बिजली बिलों को घटाने-बढ़ाने का काम किया गया। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं तो यह केवल एक कर्मचारी की मनमानी का मामला नहीं, बल्कि विभागीय व्यवस्था और निगरानी तंत्र पर भी बड़ा सवाल खड़ा करेगा।
‘बड़े खेल’ में सामने नहीं आता सीधा नाम?
उपभोक्ताओं के बीच चर्चा है कि बड़े मामलों में सीधे सामने आने के बजाय कथित रूप से बड़े बाबू के माध्यम से काम कराया जाता है। उपभोक्ताओं का आरोप है कि जब वे अपने बिल या अन्य विद्युत समस्याओं को लेकर संपर्क करते हैं तो उन्हें स्पष्ट जानकारी और संतोषजनक जवाब नहीं मिल पाता।
अधिकारियों पर दबाव बनाने की भी चर्चा
विभागीय सूत्रों के हवाले से यह भी आरोप सामने आ रहा है कि कार्यालय में कार्यरत कुछ अधिकारी कथित दबाव और मानसिक उत्पीड़न से परेशान रहते हैं। सूत्रों का दावा है कि स्थिति इतनी खराब हो जाती है कि कुछ कर्मचारियों को स्वास्थ्य संबंधी अवकाश तक लेना पड़ता है। हालांकि इस दावे की भी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
अधिकारी का कमरा बंद, जवाबदेही पर सवाल
वहीं, अधिशासी अभियंता देवेंद्र सिंह के कमरे को लेकर भी उपभोक्ताओं में चर्चा है। आरोप है कि उनका कमरा अक्सर बंद मिलता है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब उपभोक्ता अपनी शिकायत लेकर विभागीय अधिकारियों तक पहुंचना चाहता है तो उसकी सुनवाई आखिर किस स्तर पर होगी?
फोन उठाने तक से परहेज का आरोप
उपभोक्ताओं और पत्रकारों का कहना है कि विभागीय मामलों को लेकर फोन करने पर संबंधित जिम्मेदार लोग फोन उठाना तो दूर, कई बार जवाब देना भी उचित नहीं समझते। इससे विभाग की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—यदि सब कुछ नियमानुसार है तो बिजली बिलों में हुए पुराने संशोधनों, भुगतान विवरण और संबंधित अभिलेखों की निष्पक्ष जांच कराने में विभाग को आखिर परेशानी क्या है?
उपभोक्ताओं की मांग है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच कराई जाए, ताकि यह साफ हो सके कि बिलों में कब, किसके निर्देश पर और किस आधार पर बदलाव किए गए। जांच के बाद ही तय होगा कि आरोप महज चर्चाएं हैं या फिर इनके पीछे कोई वास्तविक ‘बिल खेल’ छिपा हुआ है।