*दो साल से लटका मामला, निचलौल थाने की कार्यशैली पर उठे सवाल — आईजीआरएस में भी “खाना पूर्ति” का आरोप।*

Bureau Report/ Narsingh Upadhyay /Nichlaul News 18 Plus /Sub Editor 

 

महराजगंज:जनपद के निचलौल थाना क्षेत्र में एक बार फिर पुलिस की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में है। करीब दो वर्षों से लंबित एक विवादित प्रकरण में लगातार अधिकारियों के बदलने के बावजूद पीड़ित को न्याय नहीं मिल सका है। अब मामला आईजीआरएस तक पहुंचने के बाद भी “औपचारिक निस्तारण” का आरोप लग रहा है।

 

मामले के अनुसार, तकुलडीहा निवासी प्रार्थी यशवंत विश्वकर्मा ने हरेंडीह निवासी आयुष पर जमीन बैनामा के नाम पर 5 लाख 5 हजार रुपये लेने का आरोप लगाया था। पीड़ित के अनुसार, विपक्षी ने केवल 2 लाख 95 हजार रुपये लौटाए, जबकि शेष धनराशि लंबे समय तक नहीं दी गई।

 

इस प्रकरण की जांच पहले चर्चित दरोगा रूपेश दुबे द्वारा नवंबर से फरवरी तक की गई। इसके बाद मार्च से 9 जून 2026 तक सब इंस्पेक्टर अमित विश्वकर्मा के पास मामला रहा। 10 जून 2026 को प्रकरण का “अंतिम निस्तारण” दर्शा दिया गया।

 

चौंकाने वाली बात यह है कि जांच के दौरान पुलिस ने रिपोर्ट में उल्लेख किया कि दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया है और प्रार्थी ने स्वयं कार्यवाही न करने का लिखित प्रार्थना पत्र दे दिया है। हालांकि, प्रार्थी का आरोप है कि जब भी वह थाने पहुंचा, उससे “खर्चा-पानी” लिया गया और केवल कागजी कार्रवाई कर मामले को टाल दिया गया।

 

पीड़ित का कहना है कि उसे न्याय के बजाय सिर्फ आश्वासन और दबाव मिला। उसने आरोप लगाया कि पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेने के बजाय समझौते का दबाव बनाकर निस्तारण दिखा दिया।

 

आईजीआरएस पर भी सवाल

जहां एक ओर महराजगंज पुलिस आईजीआरएस निस्तारण में प्रदेश स्तर पर अग्रणी होने का दावा करती है, वहीं इस मामले ने उस दावे की सच्चाई पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि बिना वास्तविक समाधान के ही मामलों को “निस्तारित” दिखा दिया जाता है।

 

सीओ कार्यालय पर भी उठे प्रश्न

निचलौल क्षेत्राधिकारी कार्यालय की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई मामलों में बिना समुचित जांच के ही निस्तारण कर दिया जाता है।

 

स्थानीय लोगों की तीखी टिप्पणी

क्षेत्र में यह भी चर्चा है कि थाना अब “डॉक्टरों का अड्डा” बन चुका है, जहां पहले “बीमारी” देखी जाती है और फिर “इलाज” तय होता है। लोगों का कहना है कि छोटे मामलों पर ध्यान नहीं दिया जाता, बल्कि बड़े और “फायदे वाले” मामलों को प्राथमिकता मिलती है।

 

निष्कर्ष

करीब दो साल तक चले इस प्रकरण ने निचलौल पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि समय रहते उच्चाधिकारियों ने संज्ञान नहीं लिया, तो आम जनता का भरोसा कानून व्यवस्था से पूरी तरह उठ सकता है।

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