Bureau Report /News 18 Plus Correspondent/ Nichlaul
महराजगंज। निचलौल थाना एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे एक वीडियो ने पुलिस कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वीडियो में एक व्यक्ति थाने के भीतर कथित तौर पर दोनों पक्षों के बीच सुलहनामा लिखवाते हुए दिखाई दे रहा है। स्थानीय स्तर पर दावा किया जा रहा है कि उक्त व्यक्ति कोई अधिवक्ता या अधिकृत न्यायिक अधिकारी नहीं, बल्कि थाने से जुड़ा चौकीदार या कथित दलाल है। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
वायरल वीडियो के सामने आने के बाद लोगों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि यदि थाने के भीतर पुलिस की मौजूदगी में समझौते लिखवाए जा रहे हैं, तो क्या यह स्थापित न्यायिक प्रक्रिया और सर्वोच्च न्यायालय की भावना के अनुरूप है?
जानकारों के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने कई मामलों में यह स्पष्ट किया है कि पुलिस थाने में कराए गए समझौतों को अदालतें सावधानी और संदेह की दृष्टि से देखती हैं, क्योंकि ऐसी स्थिति में दबाव, भय या प्रभाव में हस्ताक्षर कराए जाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि कानूनन शमनीय अपराधों में भी दोनों पक्षों द्वारा स्वेच्छा से किया गया समझौता संबंधित न्यायालय या मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, जहां उसकी वैधानिक जांच होती है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि पुलिस का दायित्व कानून-व्यवस्था बनाए रखना और विवेचना करना है। किसी भी पक्ष पर समझौते का दबाव बनाना या थाने में सुलहनामा तैयार कराना न्यायिक प्रक्रिया से जुड़ा संवेदनशील विषय है। वहीं, गैर-शमनीय मामलों में समझौते के आधार पर एफआईआर समाप्त करने का अधिकार भी सामान्यतः पुलिस के पास नहीं होता और ऐसे मामलों में सक्षम न्यायालय, विशेषकर उच्च न्यायालय, की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि थाना प्रभारी अंकित सिंह के कार्यकाल में थाने में समझौते कराने की व्यवस्था लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है। वायरल वीडियो के बाद यह सवाल और तेज हो गया है कि क्या थाने के भीतर अपनाई जा रही प्रक्रिया न्यायिक मानकों के अनुरूप है या नहीं।
हालांकि, वायरल वीडियो की प्रामाणिकता तथा उसमें दिखाई दे रहे व्यक्ति की वास्तविक भूमिका की आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है। पुलिस विभाग की ओर से भी इस मामले में कोई औपचारिक बयान सामने नहीं आया है।
अब लोगों की निगाहें पुलिस अधीक्षक और उच्च अधिकारियों पर टिकी हैं। यदि वीडियो सही पाया जाता है, तो यह केवल प्रशासनिक अनुशासन का मामला नहीं रहेगा, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया और कानून के पालन से जुड़े गंभीर प्रश्न भी खड़े करेगा। ऐसे में निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करना आवश्यक माना जा रहा है, ताकि जनता का कानून और न्याय व्यवस्था पर विश्वास बना रहे।