न्यूज़ 18प्लस ब्यूरो/निचलौल
महराजगंज। निचलौल थाने में लंबे समय से तैनात सिपाही मनीष सिंह को लेकर पुलिस महकमे और स्थानीय स्तर पर तरह-तरह की चर्चाएं सामने आ रही हैं। आरोप है कि लंबे समय से एक ही थाने में तैनाती के दौरान उन्होंने थाना कार्यालय के अभिलेखों, मालखाने तथा अन्य प्रशासनिक कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका बनाई है। इसी वजह से उन्हें थाने के अंदर प्रभावशाली पुलिसकर्मी के रूप में देखा जाता है।
थाना निरीक्षणों के दौरान अभिलेखों, मालखाने, शस्त्रागार, कार्यालय, रोजनामचा और अन्य रिकॉर्ड की जांच नियमित पुलिस प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है। निचलौल थाने के निरीक्षण से संबंधित सार्वजनिक रिपोर्टों में भी अभिलेखों और मालखाने की जांच का उल्लेख मिलता रहा है।
‘कारखास’ की भूमिका आखिर क्या होती है?
पुलिस व्यवस्था में ‘कारखास’ कोई औपचारिक सरकारी पद या अलग संवर्ग नहीं है। आम बोलचाल में इस शब्द का इस्तेमाल ऐसे पुलिसकर्मी के लिए किया जाता है जिसे थाना प्रभारी या वरिष्ठ अधिकारी के भरोसेमंद सहयोगी के रूप में थाना स्तर के विशेष या महत्वपूर्ण काम सौंपे जाने की बात कही जाती है।
ऐसे पुलिसकर्मी को व्यवहार में अधिकारी के निर्देश पर थाना कार्यालय के समन्वय, महत्वपूर्ण सूचनाओं के आदान-प्रदान, रिकॉर्ड/दस्तावेज संबंधी काम, अधिकारियों के आने-जाने की व्यवस्था, विभिन्न पुलिसकर्मियों से समन्वय और अन्य प्रशासनिक कार्यों में लगाया जा सकता है। हालांकि किसी पुलिसकर्मी को इस तरह की भूमिका मिलने का अर्थ यह नहीं है कि उसे कानून से अलग कोई अधिकार प्राप्त हो जाता है।
स्थानीय स्तर पर यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि यदि किसी पुलिसकर्मी की एक ही थाने में लंबे समय तक तैनाती रहती है तो क्या उसकी भूमिका और कार्यप्रणाली की समय-समय पर स्वतंत्र समीक्षा होती है? खासकर ऐसे पुलिसकर्मी के संबंध में, जिसके बारे में थाना क्षेत्र में प्रभावशाली होने की चर्चाएं हों, उसकी तैनाती, ड्यूटी और जिम्मेदारियों की पारदर्शी समीक्षा जरूरी हो जाती है।
निचलौल थाना भारत-नेपाल सीमा क्षेत्र से जुड़े महत्वपूर्ण इलाके में आता है, जहां पुलिस के सामने तस्करी, अवैध शराब और अन्य आपराधिक गतिविधियों पर नियंत्रण की चुनौती रहती है। उत्तर प्रदेश पुलिस के 2024 के एक आधिकारिक प्रेस नोट में निचलौल पुलिस द्वारा नेपाली शराब की बरामदगी की कार्रवाई भी दर्ज है।
‘संरक्षण’ किसका? जांच से साफ हो सकता है सच
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी कर्मचारी को वास्तव में असाधारण प्रभाव प्राप्त है, तो उस प्रभाव का आधार क्या है? क्या उसकी तैनाती और जिम्मेदारियां विभागीय आदेशों के अनुरूप हैं? क्या थाना प्रभारी और वरिष्ठ अधिकारियों को उसकी भूमिका की जानकारी है? क्या लंबे समय से एक ही स्थान पर तैनाती के बावजूद समय-समय पर उसका स्थानांतरण अथवा दायित्व परिवर्तन हुआ?
इन सवालों का जवाब केवल विभागीय रिकॉर्ड, ड्यूटी चार्ट, स्थानांतरण आदेश और आधिकारिक जांच से ही सामने आ सकता है।
यदि अनैतिक गतिविधियों में किसी पुलिसकर्मी की संलिप्तता या संरक्षण के आरोप लगाए जा रहे हैं, तो उनके समर्थन में शिकायत, प्राथमिकी, विभागीय जांच, वीडियो/दस्तावेज या अन्य प्रमाण सामने आना आवश्यक है। केवल स्थानीय चर्चाओं के आधार पर किसी कर्मचारी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।
वरिष्ठ अधिकारियों से जांच की मांग
ऐसे में पुलिस अधीक्षक स्तर से निचलौल थाने में लंबे समय से तैनात कर्मचारियों की तैनाती अवधि, ड्यूटी चार्ट, जिम्मेदारियों और शिकायतों की निष्पक्ष समीक्षा कराई जाए तो स्थिति स्पष्ट हो सकती है। यदि किसी कर्मचारी को नियमों से हटकर विशेष प्रभाव या जिम्मेदारी प्राप्त है, तो उसका आधार भी सामने आना चाहिए और यदि कोई आरोप निराधार है तो उसकी भी स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।
सवाल सिर्फ एक सिपाही का नहीं, बल्कि थाना व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही का है।