Bureau Report/ Dilip Kumar Pandey /Nichlaul Correspondent /Special report of /News 18 Plus
महराजगंज/निचलौल। निचलौल थाना इन दिनों अपराध नियंत्रण से ज्यादा “काराखास व्यवस्था” को लेकर चर्चाओं में है। क्षेत्र में तेजी से उठ रहे सवाल यह हैं कि आखिर थाने में इतना प्रभाव किसका है, जिसके नाम से फरियादी से लेकर स्थानीय कारोबारी तक खौफ में दिखाई दे रहे हैं? आखिर क्यों हर अवैध कारोबार, हर सेटिंग और हर दबाव की चर्चा में सबसे पहले “काराखास” शब्द सामने आ रहा है?
स्थानीय लोगों और पत्रकारों के बीच चर्चा है कि निचलौल थाना क्षेत्र में अवैध शराब, नेपाली शराब, गांजा और संदिग्ध गतिविधियों का नेटवर्क बिना संरक्षण के संभव नहीं हो सकता। आरोप यह भी है कि थाने के आसपास और मुख्य सड़कों पर कुछ होटल, ढाबे और कारोबार लंबे समय से सवालों के घेरे में हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल खानापूर्ति होती है।
सबसे बड़ा सवाल तब खड़ा हुआ जब इन मुद्दों को उजागर करने वाले पत्रकार पर कथित दबाव और धमकी का आरोप सामने आया। पत्रकार का कहना है कि खबर प्रकाशित होने के बाद उन्हें थाने बुलाया गया, सोशल मीडिया पोस्ट हटवाने का दबाव बनाया गया और कथित तौर पर कहा गया— “आप जानते नहीं हैं, पता कर लीजिए।”
क्षेत्र में चर्चा है कि थाने में सक्रिय कथित “काराखास” की पकड़ इतनी मजबूत है कि पुलिसकर्मी भी उसके सामने खुलकर बोलने से बचते हैं। लोगों का आरोप है कि थाने में आने वाले कई मामलों में पहले “काराखास” का हस्तक्षेप होता है, उसके बाद ही कार्रवाई की दिशा तय होती है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन लगातार उठ रही आवाजें पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं।
जानकारों का कहना है कि नियमानुसार किसी भी थाने में इस तरह की अनौपचारिक शक्ति संरचना का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। पुलिस व्यवस्था कानून और संविधान से चलती है, न कि किसी कथित “काराखास तंत्र” से। लेकिन निचलौल में जिस तरह चर्चाएं सामने आ रही हैं, उसने पूरे सिस्टम की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि थाने के अंदर ही भय और दबाव का माहौल होगा तो आम जनता न्याय की उम्मीद किससे करेगी? लोगों का आरोप है कि क्षेत्र में अवैध कारोबार पर कार्रवाई से ज्यादा ध्यान “मैनेजमेंट” पर दिया जा रहा है। यही कारण है कि सीमावर्ती इलाकों में नेपाली शराब और अन्य अवैध गतिविधियों की शिकायतें लगातार सामने आती रहती हैं।
पत्रकारों ने भी इस पूरे मामले को लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़ते हुए चिंता जताई है। उनका कहना है कि यदि सच दिखाने और लिखने पर पत्रकारों को ही डराया जाएगा, तो भ्रष्टाचार और अवैध कारोबार के खिलाफ आवाज कौन उठाएगा?
अब निगाहें महराजगंज के पुलिस अधीक्षक शक्ति मोहन अवस्थी पर टिकी हैं। जनता पूछ रही है कि क्या निचलौल थाने में चल रहे कथित “काराखास राज” की जांच होगी? क्या अवैध कारोबार और दबाव की राजनीति पर लगाम लगेगी? या फिर सवाल उठाने वालों की आवाज इसी तरह दबाई जाती रहेगी?